Friday, June 16, 2006

काश हमारी टीम भी होती

टेलीविज़न पर विश्व कप फुटबाल देखते हुए और मीडिया में उसे छाया देख मन में एक टीस उठती है, काश हमारी टीम भी होती इसमें। सारे गैरभारतीय पडोसी या मित्र पूछते हैं "तुम किस टीम के साथ हो?" या "तुम्हारी टीम क्यों नही है?" क्या घोर आश्चर्य लगता है उन्हे कि १२५ करोड की आबादी वाला शक्तिशाली देश एक दर्जन खिलाडी भी पैदा नही कर पाया जो विश्व स्तर पर फुटबाल खेल सकें। ऐसा भी नही कि हमारे यहाँ एकदम ही फुटबाल नही खेला जाता। कई राज्यों में यह मुख्य तौर पर खेला जाता रहा है, जैसे बंगाल या केरल या गोवा। अरे मैने भी खेला है बचपन में (भले ही स्कूल में थोडा सा ही खेला हो, और इससे बहुत ज्यादा खेला हो क्रिकेट), और मेरे जैसे कइयों ने खेला होगा, आखिर बहुत कम संसाधनों में खेला जा सकने वाला खेल है ये। जहाँ त्रिनिदाद एण्ड टोबैगो जैसे १० लाख की आबादी (मुम्बई का दसवाँ हिस्सा या भारत के किसी भी छोटे जिले की आबादी के बराबर), सउदी अरब जैसे २६ लाख की आबादी या स्विट्ज़रलैण्ड जैसे ७५ लाख (मुम्बई या कोलकाता महानगर से बहुत कम) आबादी वाले देशों की अपनी टीमें जहाँ अच्छा प्रदर्शन कर रहीं हैं, हम जनसँख्या में बहुत अधिक होते हुए भी इस महाकुम्भ से सिरे से ही गायब हैं।

कारण है कि आज भी कोई भी भारतीय परिवार अपने बच्चों को कैरियर के रूप में खेल अपनाने की सलाह नही देते। कितनी ही खेल प्रतिभायें प्रोत्साहन के अभाव में आगे नही बढ पातीं या पढाई की चक्की में पिसकर अपनी इच्छाओं का गला घोंट देतीं हैं। "पढोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलो कूदोगे तो होओगे खराब" ये आज भी कितने ही परिवारों का गुरुमंत्र है। ग्लैमर अगर खेलों से जुडा भी है तो केवल क्रिकेट से। आज भी सचिन, विश्वनाथन आनन्द या सानिया मिर्जा से ज्यादा जाना पहचाना नाम है। और भारत के धनराज पिल्लै या वाइचुंग भूटिया का नाम कितने भारतीय जानते हैं, विदेशियों की बात तो छोड ही दीजिये। भारत में भविष्य को लेकर युवा वर्ग में जो असुरक्षा की भावना है, वही कारण है कि भारत की प्रतिभायें कुछ गिने चुने खेलों को छोडकर बहुत कम ही उभर पाती हैं।

भारत में खेल संसाधनों का बेहद अभाव है। कुछ गिने चुने महानगरों को छोडकर छोटे शहरों या कस्बाई स्तर पर सुविधायें नही के बराबर हैं। अगर खेलों में होने वाले प्रति व्यक्ति खर्च को देखा जाय तो भारत बहुत बहुत पीछे नज़र आयेगा।

कभी कभी सोचता हूँ ठीक ही है जो टीम नही है हमारी। कम से कम निष्पक्ष होकर हम खेल का मजा तो ले सकते हैं। होती भी हमारी टीम अगर तो ज्यादातर एशियाई टीमों की तरह पहले दौर में ही बाहर हो जाती शायद। अभी तो हम जो भी टीम अच्छा खेलती है, उसका समर्थन कर डालते हैं। जर्मनी ठीक खेले तो वो, नही तो ब्राजील या अर्जेन्टाइना।

क्या कभी ऐसा होगा कि हमारी टीम भी विश्व कप में अपना परचम लहरायेगी? क्या कभी "जन गण मन" की धुन भी हमें विश्व कप के स्टेडियम से सुनाई देगी? शायद मेरे जीवन में ऐसा हो कभी। शायद कई साल बाद ऐसा हो कभी? शायद मेरा बेटा ऐसा होता हुआ देख पाये? आइये हम दुआ करें कि हमें मिले कभी उत्साहवर्धन के लिये एक अदद विशुद्ध भारतीय टीम (भले ही वो ज्यादातर एशियाई टीमों की तरह पहले दौर में ही बाहर हो जाये)। तब तक हम ठंडी आहों से ही काम चलाते हैं "काश हमारी टीम भी होती"।

4 प्रतिक्रियाएँ:

  • प्रेषक: Anonymous संजय बेंगाणी [ Friday, June 16, 2006 6:53:00 PM]…

    खेल संघो सें राजनीति को दूर करने से ही ऐसा संम्भव हो सकता हैं. तब तक हम आहें भरते रहेंगे कि काश हमारी टिम भी होती.

     
  • प्रेषक: Anonymous ratna [ Friday, June 16, 2006 11:17:00 PM]…

    भारत में इस बार फुटबाल के मैचों के प्रति बड़ते शौक को देख ऐसा लगता है कि आपकी इच्छा जल्द ही पूरी होगी और आप स्वयम् टीम का उत्साह बड़ाएंगे ।

     
  • प्रेषक: Blogger Manish [ Sunday, June 18, 2006 8:05:00 AM]…

    फुटबाल के विश्व स्तर को देखते हुये मुझे ऐसी उम्मीद हाल -फिलहाल में कम ही दिखती है ।

     
  • प्रेषक: Blogger ई-छाया [ Monday, June 19, 2006 11:36:00 AM]…

    संजय जी,
    खेल संघों में क्षेत्रवाद और राजनीतिक नेताओं की धुसपैठ भारत के खेलों का सचमुच दुःखद पहलू है।
    रत्ना जी,
    आपके मुँह में घी शक्कर।
    मनीष जी,
    आज हालात ऐसे हैं कि किसी विशेष दिन कोई टीम किसी को भी हरा सकती है, मानता हूँ बहुत मुश्किल है, पर असम्भव नही है।

     

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