Tuesday, May 16, 2006

डालरनामा - महिमा हरे रंग की

डालरनामा - महिमा हरे रंग की
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जिन मित्रों ने मेरा उन्नीसवीं अनुगूंज को समर्पित इसके पहले की रचना (लेख) नही पढी, उनसे अनुरोध है कि वो इसे यहाँ जरूर पढें।

हरा रंग, हरा रंग है पर्यावरणवादियों का। बेशक दुनिया में हरा रंग न हो तो कुछ भी न हो। पेड पौधे ही तो हमारी जान हैं। पूरी दुनिया अब शाकाहार की तरफ मुड रही है और हरितलवक अब हर स्वस्थ भोजन का हिस्सा है। तेजी से कम होते वन और ग्लोबल वार्मिंग (विश्व के बढते तापक्रम) पर पूरे विश्व के पर्यावरणवादी चिंतित हैं। पर मेरा लेख उस हरे रंग के बारे में नही है।

हरा ही रंग है हमारे पडोसी देश पाकिस्तान के झंडे का। मुझे नही मालूम हरा रंग इस्लाम से भी जुडा हुआ है या नही; पर मैने बहुत से मस्जिद और दरगाहों को हरे रंग से पुते हुए देखा है। इस बावत एक रोचक वाक्या याद आता है। कई साल पहले मै जिस कम्पनी में था, हमने एक तकनीकी जानकारी बॉटने के लिये एक वेबसाइट बनाई थी और वो किसी के लिये भी खुली हुई थी। कोई भी व्यक्ति उस वेबसाइट पर अपना रजिस्ट्रेशन कर सकता था और चर्चा में भाग ले सकता था। ट्रैफिक मोनीटरिंग से पहले कुछ दिनों में एक रोचक तथ्य सामने आया कि ज्यादातर लोग जिन्होने साइट पर रजिस्ट्रेशन किया वो पाकिस्तान से थे। भारतीय उस साइट तक आकर भी बिदक जाते थे कि ये कोई पाकिस्तानी वेबसाइट है और पाकिस्तानी सहज ही खिंचे चले आते थे, क्यों? क्योंकि उस वेबसाइट का बैकग्राउण्ड कलर हरा था। पर मेरा लेख उस हरे रंग के बारे में भी नही है।

फिर ये लेख है किस बारे में, भैया, लेख है उस हरे रंग के बारे में जिसके पीछे दुनिया भागती है। वो हरा रंग जिसे दुनिया पहचानती है। वो हरा रंग सो सबसे मोहक है, हॉ प्रकृति की उन मोहक छटाओं से भी मोहक, जिनमें हरे रंग की प्रधानता होती है। अगर शीर्षक से आपने कुछ अंदाजा लगाया होगा तो आप सही हैं, डालर, जी हॉ ये लेख है डालर के बारे में।

भारत की मुद्रा तो बहुरंगी है, जैसी हमारी संस्कृति है, लेकिन अमरीकी डालर का रंग है हरा, डालर की कीमत आप तब समझ सकते हैं जब आप दूर किसी देश के हवाई अड्डे पर हैं और आप वहॉ भारत जैसे किसी देश की मुद्रा निकालते हैं। यहॉ तक कि करेन्सी कन्वर्जन के लिये बैठे नराधम (मुद्रा परिवर्तक) भी डालर के अलावा किसी और मुद्रा को पहचानने से सरासर इन्कार कर देते हैं। आप डालर निकालिये, सामने वाला मुस्कराने लगता है, और आपका काम आसान।

डालर की महिमा अपरम्पार है, ये लेख तो क्या ऐसे कई लेख कम पडेंगे उसका बखान करने में। अगर आपने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का इतिहास नही पढा तो जरूर पढें यहॉ या यहॉ । अमरीका में सबसे पहले रहने वाले निवासी नेटिव इंडियन कहलाते थे। भारत की तरह ही सन् १४०० के बाद अमेरिका में भी यूरोपीय देशों (ब्रिटेन, फ्रान्स, पुर्तगाल आदि) की कई कालोनियॉ बन गई थीं और सन् १७७६ में १३ ब्रिटिश राज्यों ने स्वाधीन होने की घोषणा कर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की नींव डाली थी। अमेरिका आप्रवासियों से ही बना है। अमेरिका के ज्यादातर निवासी पूरी दुनिया से यहॉ आकर बसे हैं, ज्यादातर लोग यूरोप, उत्तरी अफ्रीका तथा मध्य पूर्व से आये हैं। एशिया से आये हुए लोगों की आबादी तकरीबन ४ प्रतिशत है। आज संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में ५० राज्य हैं।

बहुत से लोग संयुक्त राष्ट्र अमेरिका को केवल अमेरिका कहने में एतराज करते हैं क्योकि उत्तर अमेरिका पूरे महाद्वीप का नाम है जिसमें संयुक्त राष्ट्र अमेरिका एक देश है। भारत के आजाद होने के बाद कई भारतीय भी अमेरिका में आकर बसे हैं, ज्यादातर काम धन्धे वाले लोग पंजाब से या गुजरात से। गुजरात से आये हुए पटेलों के इतने मोटेल हैं कि अब मजाक में अमरीकी पटेलों को पोटेल कहा जाने लगा है। हर भारतीय अमरीकी दूतावास पटेलों के आवेदन पत्रों की बहुत बारीकी से जॉच पडताल करता है क्योंकि अमेरिका पँहुचने के लिये पटेलों ने तरह तरह के रास्ते निकाले हैं। अगर आप कभी मुम्बई स्थित अमरीकी दूतावास गये हों तो आपको यदा कदा गुजराती में होने वाली घोषणायें चौंका देंगी। कई वरिष्ठ गुजराती नागरिक ऐसे भी मिल जायेंगे जिन्हे अंग्रेजी नही आती फिर भी थोडी बहुत कठिनाई के बाद दूतावास से काम कराके ही वापस जाते हैं।

आज ज्यादातर भारतीय विद्यार्थी अमेरिका आने के सपने ही नही देखते उन्हे साकार भी करते हैं। कई अमरीकी विश्वविद्यालय भारतीय विद्यार्थियों को दाखिला ही नही देते, बल्कि उन्हे छात्रवृत्ति भी उपलब्ध कराते हैं। किसी भी समय भारत स्थित किसी भी अमरीकी दूतावास में साक्षात्कार देते हुए आप बहुत से भारतीय विद्यार्थी पा सकते हैं, और उन्हे वीसा मिलने में भी कोई खास परेशानी भी नही आती।

मैने कुछ मित्रों से यहॉ आने वाले उन लोगों के किस्से भी सुने हैं जो किसी अवैधानिक जहाज से मैक्सिको या कनाडा तक आये और फिर किसी तरह अमेरिका में दाखिल हुए। मेरे कुछ मित्रों ने यहॉ बसी हुई उन लडकियों की तलाश अपने विद्यार्थी जीवन में ही शुरू कर दी थी जो एक सुयोग्य भारतीय वर की तलाश में हों। कुछ सफल भी हुए और उन्हे एक अमरीकी नागरिक से विवाह करने के उपलक्ष्य में दुनिया की कुछ सबसे दुर्लभ चीजों में से एक, अमरीकी नागरिकता प्राप्त हुई। आज उनमें से एक तथा उनकी पत्नी अलग अलग राज्यों में रहते हैं और सप्ताहांत में ही कभी कभी मिल पाते हैं, क्या करें नौकरियॉ अलग राज्यों में हैं और एक की नौकरी से जीविकोपार्जन तो हो जायेगा लेकिन स्टेटस नही आ सकता। क्या कहा स्टेटस जरूरी नही जीवन में, अरे साहब अपनी सलाह अपने पास रखिये आप। क्या दुनिया में हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी अपने तौर से जीने का अधिकार नही। अपनी अपनी प्राथमिकतायें (प्रियोरिटीज) हैं।

मैने मेरे कई मित्रों से कई बार इस बारे में वार्ता की और पाया कि लोगों में यहॉ कुछ साल गुजारने के बाद वापस लौटने में एक डर सा व्याप्त हो जाता है। भ्रष्टाचार, प्रदूषण तथा सुख सुविधाओं का अभाव गहरे कहीं दिमाग में कहीं अपने ही देश के बारे में हौवा खडा कर देता है। मेरे एक मित्र यह मानने को ही तैयार नही थे कि भारत में भी ए टी एम् हो सकते हैं (वो कई सालों से भारत नही गये)। या यह कि भारत में भी वेब साइट से बिल अदायगी सम्भव है। आज सब सारी दुनिया सस्ते चिकित्सकीय उपचार (मेडिकल टूरिस्म) के लिये भारत भाग रही है, भारत के ही लोग भारत में उपचार कराने से घबराते हैं। मजे की बात यह कि अमरीका स्थित अमरीकी चिकित्सा संस्थानों में भी ज्यादातर चिकित्सक भारतीय ही हैं।

असल में साफ सफाई, सडकों की हालत तथा ग्राहक अधिकारों में निश्चित रूप से अमरीका भारत से बेहतर है। अगर आप किसी भी दुकान से कोई सामान लेते हैं तो सन्तुष्ट न होने पर ९० दिनों में वापस कर सकते हैं। भारत की अधिकान्श रसीदों पर लिखा होता है "भूल चूक लेनी देनी", मतलब अगर बेवकूफ बन गये हो तो वापस शकल दिखाने की कोई जरूरत नही है। अगर दिखाई भी तो भी कुछ उखाड नही पाओगे। किसी भी दुकान में जाकर आप कुछ भी छू सकते हैं। वैसे अब भारत में भी ऐसे कुछ बाजार आ रहे हैं, पर दुरूपयोग होने की सम्भावनायें दुकानदारों में डर जगाती हैं। बच्चे खिलौनों की दुकानों पर जाकर किसी भी खिलौने से घण्टों खेल सकते हैं। हर जगह मुफ्त वाचनालय (लाइब्रेरी) की सुविधा सहज उपलब्ध है आप कितनी भी पुस्तकें ला सकते हैं। चोरी आदि की घटनायें बहुत कम हैं और अधिकतर अभियुक्त पकड लिये जाते हैं। टैक्स फाइल करना तथा अन्य लालफीतासाही बहुत कम है तथा कई काम बहुत आसानी से हो जाते हैं। बहुत से सरकारी काम इन्टरनेट पर ही हो जाते हैं। विद्युत व्यवस्था में अवरोध शायद ही कभी होता हो।

एक बार इन सब चीजों की आदत पड जाने पर लोगों को वापस जाना थोडा बुरा तो लगेगा ही। वहीं दूसरी ओर भारत के कुछ सबसे बडे सकारात्मक पहलुओं में, सबसे पहले तो यह हमारी मातृभूमि है। सारे रिश्तेदार हैं भारत में। बीमार पडने पर चिकित्सा तथा दवाइयाँ बहुत सहज और सस्ती हैं। शाकाहारी लोगों के लिये भारत स्वर्ग है। यह हमारी सन्स्कृति है, जरूर ही भ्रष्ट हो रही है फिर भी सान्स्कृतिक झटकों की कोई सम्भावना नही है, या बहुत कम है। लोग इन्सानों से प्यार करते हैं, कुत्ते बिल्लियों को इन्सानी रिश्तों का विकल्प नही बनाते।

खैर ये तो थी थोडी सी तुलना, ये लिस्ट बहुत लम्बी की जा सकती है और हर किसी के अपने अपने विचार, अपनी अपनी प्राथमिकतायें हो सकते हैं इस बारे में।

मैक्सिको और अन्य लातिन अमरीकी देशों के नागरिक यहॉ हिस्पैनिक्स कहलाते हैं और उन्हे अमरीका में एक अलग एथिनिक समूह की मान्यता प्राप्त है, भले ही वे श्वेत हों या श्याम। मेरे बहुत से अमरीका आने के इच्छुक मित्रों ने पहले कनाडा या मैक्सिको का रूख किया और एक बार वहॉ की नागरिकता प्राप्त कर फिर अमेरिका आये। ये सब लिख रहा हूँ कल के बुश साहब के उस एलान के बाद जिसमें उन्होने कहा कि मैक्सिको की सीमा पर ३००० से ६००० तक सैनिक तैनात किये जायेंगे ताकि अवैध घुसपैठ को रोका जा सके। स्वागत है बुश साहब। कब सीखेगा भारत और कब लगायेगा रोक उन अवैध बान्ग्लादेशियों पर जो पहले से ही ज्यादा आबाद भारत को और ज्यादा आबाद बना रहे हैं।

खैर कुछ भी हो लेकिन कल तक जो ब्रेन ड्रेन भारत के लिये समस्या लगता था आज भारत का सबसे उजला पक्ष है। सारे नही तो ज्यादातर भारतीय भारत के पक्ष में वातावरण बनाने का काम कर रहे हैं। जो देश सापों, साधुओं तथा भिखारियों का देश माना जाता था, बडी तादाद में मेहनतकश भारतीय कम्प्यूटर (संगणक) तकनीशियनों के चलते लोग अब सिक्के का दूसरा पहलू भी देख रहे हैं। बहुत ज्यादा दिन नही हुए जब स्टीवन स्पीलबर्ग ने Indiana Jones and the Temple of Doom (इंडियाना जोन्स और टेम्पल आँफ डूम्स) नाम की फिल्म बनाई थी जो भारत का पहले वाला भ्रमकारक नकारात्मक पहलू दिखाती है। आज भारतीय समूह अमेरिका में एक शकतिशाली समूह है और बहुत से भारतीय भारत के राजदूत की तरह काम कर रहे हैं।

मै भारतीय जनता पार्टी के उस इन्डिया शाइनिंग या भारत चमक रहा है नारे की तरह नारा तो नही लगाना चाहता लेकिन आने वाला भविष्य जरूर उज्जवल है और एक दिन हमारी मुद्रा भी मुद्रा बाजार में पहचानी जायेगी, यही उम्मीद है। दोस्तों उम्मीद लगाने में क्या है, कहते हैं ना उम्मीद पर आसमान टिका है। तो आइये हम सब मिलकर उम्मीद लगाये और इंतजार करें उस दिन का जब कोई गैर-भारतीय एक लेख लिखेगा "बहुरंगी मुद्रा भारत की"।

मै जानता हूँ कई ऐसे मित्र होंगे जो मेरी बातों से सहमत नही होंगे, कुछ मेरा लिखा (अगर कहीं गलत है) सुधारना चाहेंगे, मै स्वागत करता हूँ उन सभी का।

जय भारत जय हिन्द।

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8 प्रतिक्रियाएँ:

  • प्रेषक: Blogger रजनीश मंगला [ Thursday, May 18, 2006 11:12:00 AM]…

    छाया जी, बहुत बढ़िया लिखते हैं आप। जैसा आपने कहा, मैं हर बात से पूर्णत्या सहमत तो नहीं लेकिन अभी कुछ कहने को खास है भी नहीं। इन विषयों पर मैं और मेरी पत्नी भी हमेशा बातें करते रहते हैं। अब लगता है कि देश और विदेश के बीच इस तरह के सांसकृतिक फ़ासले कम हो रहे हैं। अगर विदेशी सांसकृति को ठीक तरह समझ लिया जाए तथा वैसे ही लोग आप के आस पास हों तो भारत और विदेश कोई अधिक अंतर नहीं है। दूसरी तरफ़ मैं ये सोचता हूँ कि विदेश में तो सब कुछ है, लेकिन भारत में बहुत कुछ करने का स्कोप है।

     
  • प्रेषक: Anonymous ratna [ Friday, May 19, 2006 2:26:00 AM]…

    एक दम सही कहा है आपने । अभी छ महिने पहले तक भारतीय हवाई अड्डे पर भारतीयी मुद्रा में डियूटी फ्री दुकानों से सामान खरीदना नामुमकिन था ।

     
  • प्रेषक: Blogger अनुनाद सिंह [ Friday, May 19, 2006 4:20:00 AM]…

    लेख बहुत अच्छा लगा | हल्का-पुल्का, जानकारियों से भरा और आशा का संचार करने वाला | ऐसे ही लिखते रहिये |

    क्यों नही एक लेख विदेशों से भारत को पैसा भेजने के विविध तरीकों पर लिखें | बहुत से लोगों को फायदा होगा |

     
  • प्रेषक: Blogger Udan Tashtari [ Friday, May 19, 2006 9:55:00 AM]…

    लेख बहुत अच्छा लिखा है।

    समीर लाल

     
  • प्रेषक: Blogger Manish [ Sunday, May 21, 2006 4:51:00 AM]…

    अच्छी जानकारी मिली आपके इस लेख को पढ़ कर !

     
  • प्रेषक: Blogger ई-छाया [ Monday, May 22, 2006 12:07:00 PM]…

    रजनीश जी, रत्ना जी, अनुनाद भाई, समीर जी एवं मनीष जी,
    पढने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद। आप पढें इसीलिये मै लिखता हूँ, और आपकी प्रतिक्रियाएँ देखकर लगता है, लिखना सार्थक हुआ।

     
  • प्रेषक: Anonymous आशीष [ Wednesday, May 31, 2006 1:30:00 AM]…

    बधाई, एक संतुलित लेख के लिये !

    अपने सिक्के के दोनो पहलुओ मे अच्छा संतुलन रखा है!

    आशीष

     
  • प्रेषक: Blogger ई-छाया [ Thursday, June 01, 2006 11:56:00 AM]…

    आशीष जी, पढने/प्रशंसा के लिये धन्यवाद।

     

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