Thursday, April 27, 2006

यादों के झरोखे से (पहला भाग)

यादों के झरोखे से
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तीन पोस्ट के बाद मन फिर इस सोच में पड गया कि अब क्या लिखूँ?

मेरी एक नौकरी की बातें याद आ रहीं हैं। नौकरी थी एक प्रोद्योगिकी इकाई में।

कई सालों पहले की बात है। मेरे एक दोस्त ने मुझे पत्र द्वारा सूचित किया कि वह इस प्रोद्योगिकी इकाई में बतौर विद्युत अभियन्ता नियुक्त हुआ है और कार्य प्रारम्भ करने जा रहा है, तो मैने सोचा कि चलो इसके पहले कि मै भी कहीं व्यस्त हो जाऊँ जाकर मिल आता हूँ उससे। बस मै मेरे ही प्रदेश के एक दूसरे जिले के बेहद अन्दरूनी इलाके में स्थित उस स्थान के लिये रवाना हो गया। कई आश्चर्यजनक घटनायें हुई, जैसे कि बीच के एक लौहपथगामिनी-स्थानक से मुझे दूसरी लौहपथगामिनी से जाना था। परन्तु वहाँ से मैने जिस लौहपथगामिनी से जाने का इरादा किया था और किराया अदा कर टिकट भी ले लिया था वह अनिश्चितकालीन विलम्बित हो गयी और मै कैसे जाऊँ, कोई नही बता पा रहा था। मै उस लौहपथगामिनी-स्थानक पर अटक सा गया था। क्या करूँ क्या न करूँ, क्या वापस चला जाऊँ, बडी दुविधा में था।

काफी पूछताछ करने के बाद एक सज्जन ने बताया कि मै वहाँ से मेरे गन्तव्य तक बस से जा सकता हूँ। बस फिर मै बस-स्थानक पंहुचा और काफी भागादौडी के बाद एक बस चालक ने हामी भरी कि हाँ मै आपको उस जगह के आसपास सुविधाजनक जगह पर उतार दूंगा। वो बोला वहाँ से आपको आगे जाने के लिये कुछ ना कुछ मिल ही जायेगा। खैर कोई तीन चार घन्टे बाद मै उस तथाकथित "सुविधाजनक" जगह, जहॉ मुझे बस चालक ने उतार दिया था, खडा था और दूर दूर तक कुछ नजर नही आ रहा था। मुझे विश्वास नही हो रहा था कि विश्व में दूसरे सबसे ज्यादा जनसँख्या वाले देश भारत में कोई जगह ऐसी भी हो सकती है जहॉ दिन के एक बजे भरी धूप में भी पक्की सडक पर ऐसा सन्नाटा हो। शायद मै किसी गलत जगह तो नही आ गया।

पता नही कैसे कितनी देर किँकर्तव्यविमूढ सा खडा रहने के बाद मै किसी एक दिशा मे चल पडा। सौभाग्यवश मेरा अन्दाजा सही निकला और आगे चलकर मुझे दूर एक प्रोद्योगिकी इकाई दिखाई देने लगी। यही कोई दो तीन किलोमीटर की दूरी पर। पैदल ही मै चलता गया। जैसे जैसे मै नजदीक पँहुचता गया, आश्चर्य बढता गया, वाह क्या सुन्दर प्रोद्योगिकी इकाई बनाई थी। तो इसको कहते है जंगल में मंगल सही अर्थों में। थोडी ही देर में मै उस इकाई के मुख्य द्वार पर था। सुरक्षा कर्मियो से मैने अतिथिगृह का पता पूछा, जहॉ मेरा मित्र ठहरा हुआ था। दोपहर के तीन बजे थे और थोडी देर मे मै अतिथिगृह के उस कमरे के बाहर खडा था। मेरा मित्र रात्रि पाली करके आया था और सो रहा था। मैने उसे उठा दिया और वो मुझे अप्रत्याशित देखकर बेहद खुश हुआ।

अचानक बातें करते उसे याद आया कि आज तो साक्षात्कार चल रहे हैं, उसने मुझसे यूँ ही पूछा साक्षात्कार देना है, और थोडी ही देर में मै साक्षात्कार हेतु सुबह से आये उम्मीदवारों के बीच बैठा था, जो सुबह से इन्तजार कर करके थक और पक चुके थे। मुझे विश्वास नही हुआ जब तीन घन्टे बाद मै अकेला ही चुना गया। ये क्या था, चमत्कार या संयोग या और कुछ।

बाकी की कहानी अगली बार।