Thursday, June 01, 2006

अवसाद भरी ये दुनिया

अवसाद भरी ये दुनिया

तरह तरह के अवसाद हैं इस दुनिया में। अब देखिये क्रिकेट में भारत हार गया और वो भी बुरी तरह से। ४-१ भी कोई स्कोर हुआ। वही टीम जो युवा खिलाडियों के बल पर झंडे गाड रही थी, इतनी बुरी तरह धाराशाई हुई कि देखा न गया।। १२५ करोड लोग अवसादग्रस्त। लोगों के मूड ओफ। हर एक बन्दा बुझा बुझा। देश हो या हो परदेश क्रिकेट हमारा राष्ट्रीय गौरव है। दो भारतीय मिलें, चाहे वो लखनऊ हो या सैनफ्रांसिस्को, क्रिकेट की बात न करें, भला कैसे संभव है? अगर न करें तो जरूर कुछ असामान्य है, दोनों के बीच।

दूसरा कारण भारतीय स्टॉक मार्केट (मुद्रा बाजार कहेंगे क्या, माफ कीजियेगा अगर गलत हो) है, पहले तो गुब्बारे की तरह फूलता जा रहा था, बस फूलता जा रहा था। लोग खुश थे, कुछ जिन्होने पहले ही घबराकर शेयर बेच डाले, सर पीट रहे थे। ज्यादातर अकर्मण्य लोग बहुत खुश थे। शेयर वैल्यू दिनबदिन बढती जो जा रही थी। एकाएक पता नही क्या हुआ? दुनिया भर के बाजार क्या गिरे, भारत का भी धूल चाट रहा है। लोगों ने हजारों लाखों गँवा दिये। सरकार कहती है, म्यूचुअल फंड खरीदो, वो भी गिरे सब मुँह के बल। अब आजकल ये हाल है कि रोज सुबह ऊपर, शाम को गिर जाता है बाजार। मानों बाजार ना हुआ किसी दुकान का शटर हुआ। एक बेचारा आम आदमी जो हिम्मत करके किसी तरह पैसा लगाने को तैयार हुआ था, पुराने यू एस ६४ या केतन पारेख या हर्शद मेहता काल को भूलकर, फिर बिदक गया है। जिन्होने पैसे गवॉ दिये हैं उनके मन में अवसाद है।

मई जून का महीना बहुत सी भारतीय कम्पनियों में वार्षिक तनख्वाह वृद्धि या रेटिंग रिलीज़ होने का वक्त होता है। अब कम्पनियॉ भी क्या करें, फायदा भी तो कमाना है ना, शेयर होल्डर्स को भी जवाब देना है, और सबको तो अच्छी तनख्वाह वृद्धि दे नही सकते। बहुत से बेचारे लोगों को अच्छे काम (परफारमेन्स) के बावजूद कम तनख्वाह वृद्धि मिलती है और बॉस कहता है, तुम्हारा काम अच्छा है, पर क्या करूं यार, ऊपर से आदेश आया है। कई लोग अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं।

बारिश जल्दी हो गई। किसान चिन्ताग्रस्त है, पता नही मानसून कैसा होगा। कुछ लोग कहते हैं जिस साल जल्दी बारिश हो जाये, मानसून अच्छा नही होता। कुछ लोग बारिश जल्दी होना अपशगुन मानते हैं। पहले ही लोग कर्जा ले कर बैठे हैं, हे भगवान अगर बारिश अच्छी न हुई तो क्या होगा।

मुम्बई-पूना के लोग घबराये बैठे हैं, भारी बारिश की भविष्यवाणी पिछले साल की दर्दभरी यादें वापस लाई है। पता नही सरकार ने कितना इंतजाम किया है। पर सरकारी इंतजामों का क्या भरोसा?

वहीं अमेरिका में तटीय क्षेत्रों के लोग घबराये हैं, वापस आ रहा है हरीकेन सीज़न यानी कि चक्रवातों का मौसम। कहीं न्यू ओर्लियोन्स की तरह कैटरिना की पुनरावृत्ति न हो जाये। सरकारी इंतजामों का भरोसा लोगों को यहॉ भी नही।

आरक्षण का क्या चल रहा है? पहले तो हडताल इतने दिनों तक क्यों चली? ऐसा क्यों है कि सरकार हडताली चिकित्सकों को मनाने में असफल रही। कोई भी राजनीतिक दल हडताली चिकित्सकों के साथ नही था। क्यों सर्वोच्च न्यायालय को आना पडा बीच में? अब किस किस चीज़ के लिये सर्वोच्च न्यायालय दखल देगा। क्या पहले ही उसके पास काम की कमी है। और अब निज़ी सन्स्थानों पर भी सरकार का आरक्षण लागू करने का दवाब। क्या बच्चों को कोई भविष्य मिल पायेगा। क्या अवसादग्रस्त होकर तो नही रह जायेंगे।

मई जून के महीने होते हैं भारत में करोडों छात्रों के परीक्षा परिणामों के आने के। कई प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे आई आई टी, पी ई टी, अभियांत्रिकी प्रवेश या मेडिकल प्रवेश) के नतीज़े घोषित होने का। हजारों हजार छात्र निराश हो जाते हैं, कइयों को समुचित मार्गदर्शन उपलब्ध नही होता। भविष्य अन्धकारमय दिखाई देने लगता है।

खबरों में पढा, कुछ लोगों ने आरक्षण के चलते आत्मदाह की कोशिश की। ये भी पढा कि कुछ छात्रों ने परीक्षा परिणामों के अनुकूल न होने पर आत्महत्या कर ली। क्यों? अवसाद आता है, असहायता की स्थिति से। जब मन में ये विचार आये कि "क्या कर सकते हैं हम?"। जब कुछ अप्रिय हो रहा हो और हम कुछ कर सकने की अवस्था में न हों। जब चारों तरफ से बुरी ही बुरी खबरें सुनाईं दें। जब मन आशंकाग्रस्त हो। भविष्य अन्धकारमय दिखाई देने लगे। अवसादग्रस्त मनुष्य को सबकुछ अवसादमय दिखाई देता है और वो गाता है यह गीत "बागन में बगियन में बगरो अवसाद है, दुनिया फसाद है, सब बकवास है"।

मूलभूत कारण है, आशा। जी हॉ आशा ही निराशा का कारण है। आपकी आशाओं का पूरा न होना ही आपको अवसादग्रस्त बनाता है। निवेशक आशा करता है निवेश अच्छा होगा। विद्यार्थी आशा करता है परीक्षा परिणाम अच्छा होगा। चिठ्ठाकार आशा करता है चिठ्ठा लोग पढेंगे।

अवसाद अनुवांशिक (ज़ैनेटिक) भी होता है। कुछ लोग जल्दी अवसादग्रस्त हो जाते हैं, कुछ विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कराते हैं ( मन ही मन बुदबुदाते रहते हैं "सतयुग आयेगा - जयगुरुदेव")। आपके लालन पोषण पर भी निर्भर करता है कि आप कितनी जल्दी अवसादग्रस्त होते हैं। यदि बचपन से आपको बडे नाजों से पाला गया है तो विपरीत परिस्थितियों में आपके हाथों पैरों का जल्दी फूल जाना स्वाभाविक है। बचपन से विपरीत परिस्थितियों से लडने वाले बॉके शूर बहुत मजबूत होते हैं। उनके शब्दकोश में इस शब्द की कोई जगह नही होती।

आप किसी भी मनोरोग विशेषज्ञ का उदाहरण ले लें। सबका धन्धा अच्छा चल रहा है। दुनिया में हर जगह मनोरोगियों की सँख्या दिनबदिन बढ रही है। नित नये नये मनोरोग सुनने में आते हैं। क्यों। कारण है, संयुक्त परिवार का विघटन। लोगों का आपस में कम मिलना जुलना। रिश्तों का टूटना। हर क्षेत्र में बढती प्रतिस्पर्धायें। बढती महत्वाकांक्षायें। हर किसी के पास सुनाने के लिये बहुत कुछ है, लेकिन सुनने वाला कोई नही। हर किसी के मन में भरी हुई है भडास, कहॉ निकालें। इस दुनिया में धैर्य रखकर सुनने वाला बहुत किस्मत वालों को मिलता है, नही तो हर व्यक्ति ऐसा कि "मैने तेरा झेला, अब तू मेरा झेल"। एक अच्छा मनोरोग विशेषज्ञ बहुत अच्छा धैर्य रखकर सुनने वाला होता है।

मेरे विचार से चिठ्ठाकारी इस मामले में अवसाद कम करने का बहुत अच्छा साधन है। आप अपनी सारी भडास यहॉ निकाल सकते हैं। बिन्दास। इस दुनिया में जहाँ लोगों से मिलना जुलना कम हो गया है, सम्वाद का यह जरिया अपने विचारों को व्यक्त करने का बेहद शानदार माध्यम है। दुःख ये है कि १२५ करोड की आबादी के हिसाब से अभी भी हिन्दी चिठ्ठाकारी बहुत पीछे है। एक पुरानी सुनी बात याद आ रही है।
भारत में
कोई भी समय चाय का समय होता है।
कोई भी व्यक्ति चिकित्सक होता है (विश्वास न हो तो किसी को भी कोई बीमारी बता कर देखैं)
कोई भी जगह प्रसाधनस्थल (या मूत्रालय) होती है।
कोई भी व्यक्ति, किसी भी विषय पर कितनी ही देर तक बोल सकता है। अब देखिये मै ही कितना कुछ बोल गया ना अवसाद पर।
तो अब बस करता हूँ। चिन्ता मत करें मै आपको धैर्यपूर्वक सुनने वाला नही मानता बल्कि "मैने तेरा झेला, अब तू मेरा झेल" वाले समूह का मानता हूँ। तो मेरा हो चुका और मै तैयार हूँ आप शुरू करें।
आइये चिठ्ठाकारी बढायें और अवसाद को अलविदा कहें।

3 प्रतिक्रियाएँ:

  • प्रेषक: Blogger अनूप शुक्ल [ Thursday, June 01, 2006 6:17:00 PM]…

    मैंने यह लेख पूरा का पूरा पढ़ा। मैंने यह लेख पूरा का पूरा पढ़ा। आशा है कि आपका अवसाद कुछ हम हुआ होगा।आशा है कि आपका अवसाद कुछ हम हुआ होगा।

     
  • प्रेषक: Blogger Sunil Deepak [ Thursday, June 01, 2006 11:33:00 PM]…

    चिंता, अवसाद में उस पर लिखने से मुझे संतोष मिलता है, क्या आप को भी लिख कर संतोष मिला ? आशा है कि आप ने मुद्रा बाज़ार में बहुत अधिक नहीं खोया होगा. :-)
    सुनील

     
  • प्रेषक: Blogger ई-छाया [ Monday, June 05, 2006 12:05:00 PM]…

    अनूप जी, पूरा पढने तथा दुहरा कमेन्टियाने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।
    सुनील जी, हॉ मुझे भी अवसाद में उसके बारे में लिखना अच्छा लगता है। मुद्रा बाजार में ज्यादा नही खोया, बल्कि ये तो खरीद करने का अच्छा मौका है।

     

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