<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-26625939</id><updated>2011-12-14T18:49:29.575-08:00</updated><title type='text'>छाया (shadow)</title><subtitle type='html'>मै एक छाया हूँ एक परछाईं, एक प्रतिबिम्ब मात्र और परछाईं की कोई पहचान नही होती। परछाई के साथ कोई पहचानपत्रक जुडा नही होता। परछाईं घटती है बढती है, गायब भी हो जाती है। बस ऐसी ही एक छाया।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://chhaya-e-shadow.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/26625939/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://chhaya-e-shadow.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>ई-छाया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15074429565158578314</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>42</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-26625939.post-6854638255547560542</id><published>2007-07-05T13:51:00.000-07:00</published><updated>2007-07-05T17:59:27.089-07:00</updated><title type='text'>वापस आया अलविदा कहने</title><content type='html'>मित्रों, मै वापस तो आया हूं, लेकिन केवल अलविदा कहने। जिंदगी में भागते भागते यह अहसास ही नही हुआ कि आपको अंतिम संदेश भेजे लगभग एक साल हो गया। मै मेरे बहुत से मित्रों का शुक्रगुजार हूं कि उन्होने मुझे भुलाया नही। खासतौर पर मनीष भाई, रत्ना जी, संजय बेगाणी, सेहर (Dawn) और जगदीश भाटिया साहेबान का, जिन्होने अपने लेखों में या पत्र लिखकर मुझे याद रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अनुपस्थिति के वक्त में मै बीच बीच में कभी नारद या चिठ्ठाचर्चा पर वापस आता रहा और जब भी आया, बहुत से नये चिठ्ठाकारों को पाया, सब कुछ बदला बदला लगा, रंग रूप, माहौल, कलेवर, लोग, विषय, चर्चायें और अनायास ही नैपथ्य में कहीं यह गीत गुंजायमान हो उठा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#6633ff;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;"आइना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे --------- इस बदलती हुई दुनिया का खुदा कोई नही, सस्ते दामों में यहां रोज खुदा बिकते हैं------ मेरे अपने मेरे होने की निशानी मांगे---"&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;(खासतौर पर आइना वाले जगदीश भइया की भावुक ई-मेल के बाद यह गीत बहुत याद आया, माफ करियेगा जगदीश भइया, मै उत्तर न दे सका)। तो मेरे अपनों, मै जीवित हूं, सकुशल हूं और लगा हूं दौड में जिंदगी की जो शायद सांसें रुक जाने के बाद ही थमेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर से यह लेख लिखने के असली मुद्दे पर वापस आता हूं, "वापस आया हूं लेकिन केवल अलविदा कहने" और आपसे यह अनुरोध करने कि मेरे लिये अब चिठ्ठाकारी आगे संभव नही है। बहुत दिनों तक ऊहापोह में रहने के बाद और अपने आप से अनगिनत झूठे वादे करने के बाद, वापस लौटने के हरसंभव असफल प्रयास करने के बाद और यह जानने के बाद कि कुछ बेहद आशावादी लोग (जिन्हे मैं तहेदिल से सलाम करता हूं) अभी भी यह आशा करते हैं कि ---- शायद--- शायद एक दिन मै वापस आऊंगा, मुझे उन उम्मीदों को तोडना जरूरी लगा नही तो दिल पर जीवन भर के लिये एक बोझ रह जाता। मेरे मित्रों मुझे माफ करना, मै शायद आपमें से बहुतों की उम्मीदों पर खरा नही उतर सका, जिंदगी की व्यस्ततायें मुझसे जीत गईं और मै हार गया और हां हो सके तो कृपया मुझे भूल जाइयेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे बहुत खुशी है कि हिंदी का अभियान दिनोंदिन बुलंद होता जा रहा है। वह दिन दूर नही जब १२५ करोड की आबादी के ७० करोड हिंदी-भाषियों में से कम से कम ७ हजार तो हिंदी चिठ्ठाकार होंगे (हर एक लाख में एक चिठ्ठाकार) और उस दिन का मुझे इंतजार होगा, और मुझे यकीन है आपमें से बहुतों को होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाते जाते नारद या अन्य किसी भी हिंदी एग्रीगेटर के कर्ता धर्ता बंधुओं से करबद्ध अनुरोध रहेगा कि यदि आसानी से संभव हो तो इस चिठ्ठे को अपने एग्रीगेटर से निकाल दें, क्योंकि इस पर अब कोई भी लेख नही लिखा जायेगा। एक बात और, पिछले वर्ष बहुत से लेखों में मैने लिखा था, मै पूरी तरह से भारत वापस जाना चाहता हूं, तो मै अपनी उस बात पर कायम हूं और यदि भगवान ने चाहा तो यह जल्द ही होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पुराने लेख यहीं यथावत् छोडे जा रहा हूं, शायद इनमें से कुछ किसी दिन आपमें से किसी के काम आयेगा। कृपया भावुक संदेश देकर मुझे वापस बुलाने की कोशिशें न करियेगा। यह मेरा अंतिम लेख, और आपसे अंतिम संवाद है। आप सभी को आने वाले जीवन के लिये मंगलकामनायें और अलविदा। जय हिंद, जय भारत और जय हिंदी। &lt;strong&gt;अलविदा खुदा हाफिज़।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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के बाद, मन में कई विचार उठे और लगा कि कुछ लिखूं।&lt;br /&gt;बहुत सारे मतलब निकाले जाते रहे हैं इस एन आर आई शब्द के। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ प्रचलित मतलब इस प्रकार हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१। नान रिलायबल इन्डियन (non reliable indian) &lt;br /&gt;२। नान रिस्पेक्टेड इन्डियन (&lt;a href="http://www.littleindia.com/news/146/ARTICLE/1190/2006-02-12.html"&gt;non respected indian&lt;/a&gt;)&lt;br /&gt;३। नान रिटर्नेबल इन्डियन (&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/indepth/story/2004/01/040108_nri_achala.shtml"&gt;non returnable indian&lt;/a&gt;)&lt;br /&gt;४। नॉट रियली इन्डियन (not really indian)&lt;br /&gt;५। नाउ रिक्वायर्ड इन्डियन (&lt;a href="http://www.femaonline.com/nricorner/nri_defin.htm"&gt;now required indian&lt;/a&gt;)&lt;br /&gt;६। न्यूली रिस्पेक्टेड इन्डियन (newly respected indian)&lt;br /&gt;७। नेवेर रिटर्नेबल इन्डियन (never returnable indian)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असली मतलब तो है नान रेसीडेन्ट इन्डियन (non resident indian) आप्रवासी भारतीय, पर वह कहीं खो गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सरकारी परिभाषायें&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;फेमा (फोरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट) के अनुसार एन आर आई है वह कोई भी व्यक्ति जो देश से बाहर है। विदेश में पढने आने वाले विद्यार्थी भी फेमा के अनुसार एन आर आई हैं।&lt;br /&gt;वहीं इनकम टैक्स के नियमों के अनुसार मोटे तौर पर अगर किसी वित्तीय साल में कोई व्यक्ति १८२ दिनों से कम भारत में रहा है तो वह एन आर आई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बाकी भारतीयों की परिभाषा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मोटा मालदार, वह व्यक्ति जो सुख सुविधा के लिये देश छोड गया। कोई भी आपको एक अलग ही चश्मे से देखता है। कुछ अपवादों को छोडकर लगभग हर दोस्त या रिश्तेदार भले ही कुछ कहे न, पर आपसे कुछ न कुछ चाहता है। आप कौतूहल का विषय हैं। एन आर आई एक तमगा है, जिसे आप चाह कर भी नही उतार सकते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग भले ही कहने को कह दें कि मै उन में से नही जो पैसे या कैरियर के लिये अपने देश को छोड जाऊं, पर मौका आने पर आप देख सकते हैं कि वे खुद भी लगे पडे हैं लाइन में। बहरहाल एन आर आई होने के बाद आप पहले वाले भारतीय नही रह जाते। भले ही आप जिस देश में रहते हों वहां सबसे गरीब हों पर भारत में आप बहुत पैसे वाले हैं, यह भावना आप लोगों के मन से निकाल नही पाते, भले ही आप भारत लौट जायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एन आर आई&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;खुद एन आर आई बेचारा, गली के कुत्ते सी हालत वाला होता है, न घर का न घाट का। विदेश में, जहां बस गया है, हमेशा बाहर वाला माना जाता है। सहकर्मी उसे बाहरी इंसान मानते हैं, कहीं डरते भी हैं कि ये लोग हमारी और हमारे देशवासियों की नौकरी खा रहे हैं। काले लोग आक्रमण करते हैं, लूटते हैं, गोरे अपने में शामिल नही करते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुद के विदेश में ही पले बढे बच्चे भी अजीब संघर्ष में जीते हैं और उसे जिम्मेदार मानते हैं अपनी पहचान के संकट के लिये। देश में तो लोग उसे अपने जैसा मानते ही नही। बेचारा पुराने गाने सुनता है। बच्चों को हिंदी सिखाने की असफल कोशिश करता है। अपने तीज त्यौहारों से जुडे रहने की कोशिश करता रहता है। देश की हर खबर से जुडा रहता है। अपने समाज के कार्यक्रम करता है, अपने जैसे लोगों में बैठने की कोशिश करता है। हर साल देस जाकर जैसे वह किसी पाप का प्रायश्चित करना चाहता है। बहुधा देस से रोग बीमारी या बुरे अनुभव लेकर आता है, पर अगले साल फिर तैयार जाने के लिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल में कहीं न कहीं हर वक्त कुछ छुट गया सा लगता है। अपने भाई, बहन, मां, बाप, नाते, रिश्तेदार, यार, दोस्त, गली, सडक, मोहल्ले, स्कूल, कालेज, गांव, शहर, कस्बे सब याद आते हैं। एक अन्तर्द्वन्द हमेशा मन में चलता रहता है, लगता है बस लौट जायें, अब बहुत हुआ, पर थोडा और थोडा और करके एक दिन पाता है कि अब वह चाहे तो भी लौट नही सकता। तिनका तिनका कर के बसाया गया आशियाना अब अपना सा लगता है। और सोचता है अपना देश अब अपने जैसा नही लगा, पिछली यात्रा के दौरान। पुराने लोग नही रहे, पुराने तौर तरीके नही रहे। पुराने गली मोहल्ले, माकान, सडक नही रहे। अब फिर से एक बार नई जगह बसने का संकट कौन मोल ले। दोस्त रिश्तेदार अब तुम्हारे बिना जीना स्वीकार कर चुके हैं। और तुम्हारी जडें अब यहां जम चुकी हैं। बच्चों की पढाई का क्या होगा? देस का तो सिस्टम ही अलग है। बच्चे तो जाना ही नही चाहते, उनका बस चले तो साल में एक बार जो जबरदस्ती ले जाये जाते हैं, वो भी नही जायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओह्ह, इधर कुंआ उधर खाई, बीच में बेचारा एन आर आई।&lt;br /&gt;और पढना चाहें तो &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/indepth/story/2004/01/040107_nri_firstperson.shtml"&gt;सपने, संताप और सवाल&lt;/a&gt;   &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/indepth/story/2004/01/040108_nri_achala.shtml"&gt;&lt;br /&gt;जो लौट नहीं सके....&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/specials/120_nri_worldwide/"&gt;&lt;br /&gt;या देखें&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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आई'/><author><name>ई-छाया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15074429565158578314</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-26625939.post-115532356889127783</id><published>2006-08-11T12:01:00.001-07:00</published><updated>2006-08-11T12:15:58.256-07:00</updated><title type='text'>विदेश यात्रा करने से पहले</title><content type='html'>मुझे याद है जब मै पहली बार देश छोडकर कुछ दिनों के लिये ही सही, विदेश जाने वाला था तो क्या रखूं क्या न रखूं, तैयारी कैसे करूं, जैसे बेहद जटिल सवाल मुझे मथ रहे थे। मैने अंतरजाल पर भी बहुत ढूंढा, लेकिन कुछ खास नही मिला। जो मिला वो भी अंग्रेजी में था, और अधूरा था और हम भारतीयों के लिये ज्यादा उपयोगी नही था। उस यात्रा और उस के बाद की कई यात्राओं की तैयारियों में मैने बहुत कुछ सीखा। बहुत दिनों से सोच रहा था कि ऐसा कुछ हिंदी में होना चाहिये। अतः पेश है एक सूची, लेकिन इसके पहले कि आप इसे पढें या उपयोग में लें, एक निवेदन है कि इस तरह की कोई भी सूची कभी पूरी नही हो सकती, तो जो लोग मेरी तरह इस स्थिति में हैं कि कुछ जोड या घटा सकते हैं, कृपया मेरी मदद करें। आपके संशोधन टिप्पणियों में लिखें या अपने चिठ्ठे पर लिखें। उद्देश्य मात्र इतना ही है कि मेरे अनुभव दूसरों के काम आयें। मेरी तरह अगर कोई अंतरजाल पर ढूंढे तो उसे शायद यह मिल सके और अगर किसी की थोडी मदद हो सके, तो लिखना सार्थक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो अलग अलग जगहों पर जाने के लिये तैयारी अलग अलग तरीके से की जानी चाहिये, और सबसे अच्छा तरीका है उस जगह (गंतव्य) पर पहले से बसे आपके जैसे ही कुछ लोगों से संपर्क करें और उपयोगी जानकारियां हासिल करें। इसके साथ ही आपकी यात्रा का उद्देश्य क्या है, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। लेकिन फिर भी पेश है एक सूची और कुछ हिदायतेंः-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१) चेक इन किया जाने वाला सामान - आम तौर पर किसी भी अंतर्राष्ट्रीय यात्रा के लिये दो प्रकार के सामान उपयोग किये जाते हैं। पहले वह जो कि "चेक इन" किये जा सकें, मतलब वह सामान जो आपकी यात्रा की शुरुआत में एयरलाइन आपसे ले लेगी और आपकी यात्रा के अंतिम हवाई अड्डे (एयरपोर्ट) पर आपको वापस मिलेगा। कृपया अपनी एयरलाइन से यह जांच कर लें कि कितने चेक इन बैग्स ले जाये जा सकते हैं, उनका अधिकतम आकार कितना हो सकता है, और उनमें कितना भार ले जाने के लिये आप बिना किसी जुर्माने के अधिकृत हैं। भार अधिक होने पर आपको जुर्माना भरना पड सकता है। आकार निर्धारित आकार से बडा होने पर एयरलाइन उसे लेने से मना कर सकती है। चेक इन बैग का आकार लंबाई, चौडाई व ऊंचाई जोडकर ६२ इंच से अधिक नही होना चाहिये। साधारणतया २८ से ३० इंच लंबा १८ से २० इंच चौडा और १२ से १५ इंच मोटा बैग प्रयोग किया जाता है। आम तौर पर भारत से यूरोप के लिये प्रति व्यक्ति एक चेक इन बैग ले जा सकते हैं और वजन १५ से २० किलोग्राम (एयरलाइन से पता करें), अमेरिका के लिये प्रति व्यक्ति दो चेक इन बैग ले जा सकते हैं और वजन २५ से ३० किलोग्राम तक हो सकता है। कोशिश करें कि बैग ज्यादा खाली या ज्यादा भरा न हो। अगर पहिये वाला हो तो आपको अधिक सुविधा होगी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;२) कैरी आन किया जा सकने वाला सामान - यह वह सामान है जो आप अपने साथ रख सकते हैं। ज्यादातर यह सामान पहिये वाला छोटा बैग होता है, यदि इसमें पकडने के लिये लंबा हैंडल हो बहुत अच्छा। इसमें कोई भी धारदार वस्तु न रखें, यदि आप अपना शेविंग किट या लाइटर इस बैग में रखते हैं तो सुरक्षा जांच में आपको वह फेंकना पडेगा। इसके लिये भी अपनी एयरलाइन से जांच कर लें कि इनका अधिकतम आकार कितना हो सकता है, और उनमें कितना भार ले जा सकते हैं। वैसे सामान्यतः कैरी आन किये जाने वाले सामान का वजन कोई नही करता, लेकिन यह हवाई जहाज के अंदर आपकी सीट के ऊपर बने लोफ्ट में या आपकी सीट के नीचे आने लायक होना चाहिये। सामान्यतः इनमें ८ से १० किलोग्राम वजन लेकर आप चल सकते हैं। यह हमेशा प्रति व्यक्ति एक ही ले जाया जा सकता है। लैपटॉप या महिलाओं का पर्स या छोटे बच्चों का नैपी बैग अलग से ले जाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३) अपने सामान में औपचारिक (फार्मल) तथा अनौपचारिक (इनफार्मल) दोनों तरह के कपडों का उचित अनुपात रखें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४) गंतव्य स्थल के वातावरण के अनुसार गर्म कपडे आदि रखें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५) सफर करते समय बडे बडे जेबों वाले कपडे पहनें। ऐसा करने से आप बहुत से कागज, दस्तावेज, पासपोर्ट आदि जल्दी जल्दी इधर उधर भागते समय सुविधापूर्ण तरीके से जेब में डाल सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;६) सफर के समय कुछ सामान्य दवाइयां रख लें (सरदर्द, पेट, बुखार आदि), लेकिन दवाइयों के साथ डाक्टर का प्रिस्क्रिप्शन भी रख लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;७) अगर चश्मा पहनते हैं, तो एक बैकअप चश्मा जरूर रखें, वैसे अगर लंबे समय के लिये बाहर जा रहे हैं और चश्मे का नंबर स्थिर है, तो दो से ज्यादा चश्मे रखें, क्योंकि ज्यादातर नया चश्मा बनवाना भारत से विदेश में बहुत ज्यादा महंगा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;८) पासपोर्ट की कई ज़ीरॉक्स करवा लें और अलग अलग सामानों में रखें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;९) पासपोर्ट किसी भी हालत में न गुमायें, अगर गुम जाता है तो आप बडी मुसीबत में पड सकते हैं। लेकिन ऐसा हो जाने पर भी अगर आपके पास उसकी कोई ज़ीरॉक्स प्रति है, तो आप अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१०) अगर हो सके तो कमर में बांधने वाला चमडे का "पाउच" या पट्टे सरीखा बैग या पर्स खरीद लें, यह पासपोर्ट आदि रखने के लिये सबसे बेहतर होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;११) भारतीय मसाले हर जगह नही मिलते, और मिलते भी हैं तो बहुत महंगे। अपने साथ कुछ पैकेट रख लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१२) बिजली का कोई भी उपयंत्र रखने से पहले यह पता करें कि गंतव्य स्थल पर कितने वोल्ट या फ्रिक्वेंसी की विद्युत प्रणाली है, जैसे अमेरिका में ११५ वोल्ट है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१३) अपने साथ गंतव्य के जरूरी फोन नंबर बहुत संभाल कर रख लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१४) यदि कहीं पर भी आपकी फ्लाइट छूट जाये, घबरायें नही, एयरलाइन्स के लोगों से संपर्क करें। वे आपके रुकने का इंतजाम करेंगे। आपको फोन काल करने व खाने के लिये कूपन भी देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१५) हो सके तो यात्रा शुरू करने से पहले गंतव्य स्थल की कुछ मुद्रा खरीद कर रख लें। इसके लिये आपके पास वैध वीसा और टिकट होना चाहिये। यह मुद्रा आपको विमान में कुछ खरीदने या स्नैक्स के लिये या उतरने के तुरंत बाद काम में आ सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१६) अपने ट्रैवेलर्स चेक आदि संभाल कर रखें, उसकी रसीद दूसरी जगह पर रखें। कागज आदि निकालते समय ध्यान रखें कि आप उन्हे गिरा न दें। ट्रैवेलर्स चेक खो जाने पर तुरंत ग्लोबल नंबर पर फोन कर उसे निरस्त कर दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१७) शेविंग किट साथ ले जाने वाले (कैरी आन) सामान में न रखें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१८) सामान में कोई खुला खाने का सामान न रखें, मतलब सारा खाने का सामान सील्ड पैक करके ही रखें, नही तो वह फेंक दिया जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१९) हवाई जहाज में ज्यादा न खायें। हमेशा हल्का फुल्का खायें और थोडा सोने की कोशिश करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२०) यदि दो लोग साथ सफर कर रहे हों तो एक घडी में स्थानीय समय (जो कि बदलता रहेगा, इसके लिये फ्लाइट में होने वाला प्रसारण देखें) और दूसरी घडी में गंतव्य या जहां से शुरू किया था उस जगह का समय रखें। या फिर दो समय दर्शाने वाली एक घडी रखें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२१)  यदि किसी से कहीं मिलने का निश्चय किया है, पूरी तौर पर पक्का कर लें कहां मिलना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२२)  यदि कस्टम में कुछ डिक्लेयर करने लायक (जैसे जानवर की खाल आदि) है तो कस्टम के लाल दरवाजे से निकलें और फार्म भरें, नही तो हरे दरवाजे से निकल जायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२३) किसी भी फ्लाइट में धूम्रपान वर्जित है। फिर भी अगर तलब हो रही है तो पहले पूछताछ करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२४) हवाई जहाज में अपने से पहले महिलाओं बच्चों और वृद्धों को चढने व उतरने दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२५) यदि आप शाकाहारी हैं तो टिकट लेते समय ही एजेंट को बता दें। इसके बावजूद बहुत सावधान रहें। कोई भी सफेद चटनी अंडे की हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२६) उडान में कभी भी ज्यादा मद्यपान न करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२७) बच्चों के साथ सफर करते समय ध्यान रखें कि जरूरत होने पर आप एयर होस्टेस से खिलौने या पुस्तकें मांग सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२८) सामान पैक करते समय अपने कपडे व सामान कुछ इस तरह सारे बैगों में रखें कि कोई एक बैग गुम जाने या अवलंबित हो जाने पर आप बिल्कुल अपाहिज न हो जायें। सफर में सामान गुम जाना एक आम बात है। ज्यादातर आपका सामान आपको गंतव्य पर पंहुचने के बाद कुछ दिनों या घंटों में मिल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२९) अपने साथ थोडी रुई या इयर प्लग रखें। कभी कभी उडान के दौरान दवाब बदलने से कान में दर्द होने पर इस्तेमाल करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३०) यदि गंतव्य पर बहुत से लोगों से मिलने वाले हैं, देने के लिये छोटे छोटे उपहार रख सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३१) यदि कोई पुराने कपडे जिन्हे आप वापस लाने में इच्छुक न हों, रख सकें या पहन सकें तो आपके लौटते समय उन कपडों के कारण बची जगह का उपयोग खरीदे गये स्मृतिचिह्न आदि ृकने में कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३२) अपने साथ कम से कम पांच छः जोडी अधोवस्त्र (अंडरवियर व बनियान) रखें। कई जगह सप्ताह में एक बार मशीन से कपडे धोने का मौका मिलेगा, वहां काम आयेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३३) कपडे इस तरह के रखें कि एक या दो जोडी जूतों के साथ काम चल सके। वैसे काले जूते सबके साथ चल जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३४) विदेश में होटेल से फोनकाल करने से पहले हमेशा पता करें कि कितना पैसा ज्यादा देना पडेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३५) होटेल छोडने से पहले उसका पता या कार्ड लेना न भूलें। भाषा की जानकारी न होने पर भी होटेल लौटने के लिये आप कार्ड दिखा कर काम चला सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३६) अगर भारत से अमेरिका जा रहे हैं तो आपको पंहुचने के बाद कुछ दिनों तक "जेट लैग" का सामना करना पड सकता है, जिसमें आपको रात में नींद खुल जाने और दिन में नींद आने की परेशानी का सामना करना पड सकता है, क्योंकि आपका शरीर भारत में नियमित दिनचर्या का अभ्यस्त है। परेशान न हों यह कुछ दिनों मे अपने आप ठीक हो जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३७) लंबी हवाई यात्रा के दौरान बीच में थोडी वर्जिश करें। इससे आपको पैर सूजने, थकान या पीठ के दर्द में थोडा आराम मिलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३८) सामान चेक इन करते समय निवेदन करें कि अंतिम गंतव्य स्थल के लिये चेक इन करें। आप खुद चेक इन टैग में देखकर यह निश्चित करें कि यह ठीक है और अंतिम गंतव्य स्थल को दर्शा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३९) अपने हर सामान के ऊपर बडे बडे अक्षरों में अपना नाम पता चिपकायें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४०) अगर कोई द्रव पदार्थ ले जाना जरूरी हो, तो उसे प्लास्टिक बैग में रखें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४१) अपने साथ एक अच्छा पेन जरूर रखें, यात्रा के दौरान बहुत से फार्म भरने पडते हैं। भले ही आपको कोई लेने आ रहा हो, फिर भी होटेल का पता रखें, हो सकता है किसी फार्म में ही भरना पडे। थोडा पेपर या छोटी नोटबुक भी रखें, शायद कहीं कुछ नोट करने की इच्छा हो जाये या किसी से मुलाकात हो जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४२) एक चादर और छोटी तौलिया रखें, क्या पता कहां जरूरत पड जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और ज्यादा टिप्स के लिये &lt;a href="http://www.afn.org/~afn11300/packing.html"&gt;यहां&lt;/a&gt; &lt;a href="http://www.afn.org/~afn11300/hints.html"&gt;यहां&lt;/a&gt; या &lt;a href="http://www.ricksteves.com/plan/tips/packlist.htm"&gt;यहां&lt;/a&gt; देख सकते हैं। या &lt;a href="http://www.freetraveltips.com"&gt;फ्री टैवेल टिप्स&lt;/a&gt; पर भी जा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन्यवाद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टैगः &lt;a href="http://technorati.com/tag/anugunj" rel="tag"&gt;foreign travel checklist&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tag/foreign"rel="tag"&gt;विदेश यात्रा&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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रंग की थी।&lt;br /&gt;दुनिया में सबसे ज्यादा प्रचलित नाम है "&lt;strong&gt;मोहम्मद&lt;/strong&gt;"।&lt;br /&gt;विश्व में सारे महाद्वीपों का अंग्रेजी नाम उसी अंग्रेजी अक्षर से शुरू होता है, जिससे समाप्त होता है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;TYPEWRITER&lt;/strong&gt; अंग्रेजी भाषा का सबसे बडा अक्षर है जो कि कीबोर्ड की एक ही पंक्ति से टाइप किया जा सकता है। क्या आप हिंदी भाषा का ऐसा शब्द ढूंढने में मेरी मदद करेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिलायें पुरुषों से दुगुनी बार पलक झपकाती हैं।&lt;br /&gt;चाहें भी तो आप अपनी सांस रोककर अपने आपको नही मार सकते।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आप अपनी कोहनी को जीभ से कभी नही चाट सकते।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;छींकने पर लोग "&lt;strong&gt;Bless you&lt;/strong&gt;" ब्लेस यू बोलते हैं क्योंकि छींकते वक्त आपका हृदय एक मिलीसेकण्ड के लिये रुक जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुअरों के लिये आसमान की तरफ देखना शारीरिक संरचना के तौर पर संभव नही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी का सबसे कठिन बार बार न बोला जा सकने वाला वाक्य है "&lt;strong&gt;sixth sick sheik's sixth sheep's sick&lt;/strong&gt;", अब बतायें हिंदी का ऐसा वाक्य कौन सा है "&lt;strong&gt;चंदा चमके चमचम चीखे चौकन्ना चोर&lt;/strong&gt;" या "&lt;strong&gt;पके पेड पर पका पपीता&lt;/strong&gt;" या "&lt;strong&gt;कच्चा पापड पक्का पापड&lt;/strong&gt;" या कोई और?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप बहुत जोर से छींकते हैं तो आप अपनी गले की हड्डी तोड सकते हैं।&lt;br /&gt;और अगर आप बहुत जोर से आती छींक &lt;strong&gt;रोकते&lt;/strong&gt; हैं तो आप सिर या गले की अपनी खून की एक नलिका तोड सकते हैं और मर भी सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताश के पत्तों में मौजूद सारे चार राजा, ऐतिहासिक रूप से महान थे -&lt;br /&gt;स्पेड - किंग डेविड&lt;br /&gt;क्लब्स - महान सिकंदर&lt;br /&gt;हर्ट्स - कार्लेमैग्ने&lt;br /&gt;डायमण्ड - जूलियस सीज़र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;१११,१११,१११ का १११,१११,१११ में गुणा करने पर प्राप्त होता है १२,३४५,६७८,९८७,६५४,३२१&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;(111,111,111 x 111,111,111 = 12,345,678,987,654,321)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर किसी पार्क में घोडे पर बैठे हुए किसी व्यक्ति या महिला की प्रतिमा में घोडे के दोनों सामने के पैर हवा में हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि उस व्यक्ति या महिला की मृत्यु युद्ध में लडते हुए हुई थी, यदि घोडे का एक पैर हवा में है तो यह इस बात का संकेत है कि उस व्यक्ति या महिला की मृत्यु युद्ध से मिले घावों के कारण हुई थी, यदि घोडे के चारों पैर जमीन पर हैं तो यह इस बात का संकेत है कि उस व्यक्ति या महिला की प्राकृतिक मृत्यु हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया में कभी खराब न होने वाला एकमात्र खाद्य पदार्थ है "&lt;strong&gt;शहद&lt;/strong&gt;"।&lt;br /&gt;एक घडियाल अपनी जीभ बाहर नही निकाल सकता।&lt;br /&gt;एक घोंघा तीन वर्ष तक सो सकता है। (नींदप्रिय लोग भगवान से अगले जन्म में घोंघा बनाने की मांग कर सकते हैं)&lt;br /&gt;सारे ध्रुवीय भालू (पोलर बियर) वामहस्त (left handed) होते हैं।&lt;br /&gt;तितलियां किसी भी वस्तु को जीभ से चखती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया का एकमात्र न कूद सकने वाला जानवर &lt;strong&gt;हाथी &lt;/strong&gt;है।&lt;br /&gt;दुनिया में औसत तौर पर लोग मकडियों से मृत्यु से भी ज्यादा डरते हैं। (मकडी बोले तो शबाना आजमी, नही क्या)&lt;br /&gt;'assassination' व 'bump' जैसे शब्दों का आविष्कार शेक्सपियर ने किया।&lt;br /&gt;कीबोर्ड पर केवल बायें हाथ से टाइप किया जा सकने वाला अंग्रेजी शब्द है "&lt;strong&gt;Stewardesses&lt;/strong&gt;"।&lt;br /&gt;चींटी बेहोश होने पर हमेशा उसकी दाईं तरफ ही गिरती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"The electric chair" या बिजली की कुर्सी का आविष्कार एक दांतों के डाक्टर(dentist) ने किया था।&lt;br /&gt;मानव हृदय कार्य करते समय खून को तीस फुट की ऊंचाई तक फेंकने लायक दवाब बनाता है।&lt;br /&gt;चूहे बच्चे पैदाकर अपनी संख्या इतनी तेजी से बढाते हैं कि दो चूहे १८ महीनों में दस लाख से अधिक हो सकते हैं।&lt;br /&gt;कान में एक घण्टे हेडफोन लगाने से आपके कान में बैक्टीरिया &lt;strong&gt;७०० गुना&lt;/strong&gt; बढ जाते हैं।&lt;br /&gt;सिगरेट लाइटर का आविष्कार माचिस से भी पहले हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;९५ प्रतिशत लिप्स्टिक बनाने में मछली की खाल पर पाये जाने वाले स्केल्स का उपयोग होता है।&lt;br /&gt;दुनिया में हर व्यक्ति की उंगलियों के अलावा जीभ का निशान भी अलग अलग होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अंत में&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;९९ प्रतिशत लोग जिन्होने इसे पूरा पढा उन्होने अपनी कोहनी को चाटने की कोशिश की है।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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III</title><content type='html'>ग्रीष्मावकाश की पिछली दो किश्तों में मैने लिखा ग्रीष्मावकाश के मेरे इंतजार और दादा दादी के घर पर बिताई गई कुछ छुट्टियों के बारे में, इस बार पेश है मेरे नाना नानी के घर पर मेरे बचपन के अवकाश के क्षणों की बानगियां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे नाना नानी का घर एक ऐसे देहात में था, जहाँ शायद आज भी बिजली नही है (कम से कम चार साल पहले तक तो नही थी, जब मै पिछली बार वहाँ गया था)। वहां पँहुचने के लिये हमें हर तरह के साधनों का इस्तेमाल करना पडता है। पहले रेल, फिर बस, फिर जीप (जिसमें इतनी सवारियां बिठाई जातीं हैं, कि गिनीज़ बुक वाले कभी भी उसे देख कीर्तिमान दर्ज कर सकते हैं), फिर घोडागाडी (जिसे वहां की स्थानीय भाषा में खडखडा कहते हैं, और जिसमें जुते हुए घोडे की पीठ से हमेशा खून रिस रहा होता है, वैसे खडखडे में एक बार बैठ कर ही आप जान सकते हैं कि उसे खडखडा क्यों कहते है?), फिर बैलगाडी (जो बेहद धीरे चलती है), बैलगाडी तक आते आते हम बेहद थके होते फिर भी क्या मजाल कि सो जायें, बराबर आस पास की उडती धूल, कौतूहल से हमें निहारती फटे कपडे पहने ग्रामीणों की निगाहों को और उनके मिट्टी के कच्चे घरों को ताका करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डाकुओं, भूतों, जातीय संघर्षों, वैमनस्य की दुनिया से परिचय हमारा नाना नानी के घर में होता। रास्ते में पडती एक बिना बांध की नदी, जो हर साल अपने रास्ते बदल लेती। जिसे पार करने के लिये बैलगाडी नदी के बीच में घुसकर निकालती, क्योंकि कोई पुल नही था, लेकिन ग्रीष्म में नदी सूखकर एक छोटे नाले का रूप ले लेती थी, इसलिये पार करना कोई खास परेशानी की बात नही होती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाना जी पुराने समय के बहुत बडे जमींदार थे इसलिये नाना नानी के घर दूर दूर तक फैले खेत थे, न जाने कितनी गायें, भैंसे, नौकर चाकर, ट्रैक्टर, हल, बगीचे (आम के पेड) आदि आदि। दुर्गम इलाके में होने के कारण भाला बरछी जैसे पारंपरिक हथियारों के साथ कुछ लायसेंसी हथियार भी थे (पहली बार बंदूक चलते भी वहीं देखी थी)। सुबह दिन निकलते ही जीवन शुरू हो जाता और सांझ ढलते ही सिमट जाता। बिजली न होने से लालटेन या ढिबरी की रोशनी से काम चलाया जाता, पर रातें जल्दी होतीं। झकाझक सफेद चादरों के बिस्तर में छत पर बहुधा नानी हमें कोई कहानी सुनातीं, ज्यादातर उस दुःखी राजकुमारी की, जिसे बचाने राजकुमार कहानी के अंत में आता और तब तक हमारी पलकें नींद से भारी हो चुकी होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी रात में कहीं दूर रोशनी चमकती दिखती और लोग सावधान होने लगते, डाकू तो नही आ गये।&lt;br /&gt;मामा के पास कुछ घोडे भी थे। मुझे बेहद कौतूहल होता जब मै उन्हे घोडे पर बैठ पल में दूर पगडंडी पर ओझल हो जाते देखता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर का बना गुड, मक्खन, सिरका, दही खाते, घर की गायों का दूध पीते, अपने ही बगीचों की सब्जियां खाते, हैंडपंप या ट्यूबवेल में नहाते और अपने ही वृक्षों के आम खाते वो सुनहरे दिन कब बीत जाते, पता ही नही चलता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वापसी के लिये पुनः होती एक रेल यात्रा। और हम वापस आ जाते अपनी दुनिया में। स्कूल, होमवर्क, कक्षा, प्रतिस्पर्धा और पढाई की दुनिया में। लेकिन वापस आते समय हमारे मन बुझे होते और फिर शुरू होता इंतजार अगले साल का जब हमारा अंतिम पेपर हो जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साल दर साल यह इंतजार चलता रहा, जब तक कि मै विद्यालय छोडकर महाविद्यालय न पंहुच गया, जहाँ सेमेस्टर सिस्टम के कारण ग्रीष्मावकाश की पद्धति ही नही थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी सोचता हूँ अगर अभी भी किसी प्रकार से मुझे एक महीने का अवकाश मिले, और दूर कहीं ऐसी दुनिया में जाऊँ, जहाँ मोबाइल, पेजर, इंटरनेट, लैपटाप, कम्प्यूटर, ई-मेल, मीटिंग्स, प्रोजेक्ट जैसे शब्द न सुनने पडें। जहां काम पर न जाना हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रीष्मावकाश - II पर की गई सुनील जी की टिप्पणी से मै सहमत हूँ, पर फिर भी कभी कभी मुझे समझ नही आता कि तब या अब ज्यादा दुःख मुझे ग्रीष्मावकाश न होने का है, या उस बचपन के जाने का, जो कभी लौटकर नही आ सकता। वो किस्सो कहानियों खेलों में डूबे हुए दिन, वो दिन जब हम सारे जहाँ की चिन्ताओं से मुक्त थे, सारी जिम्मेदारियों से परे, अगर लौट भी आयें तो क्या हम वैसे ही निश्छल, निश्चिंत होकर उसका आनंद उठा पायेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर याद आती है जगजीत व चित्रा सिंह की गाई गजल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो&lt;br /&gt;भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी&lt;br /&gt;मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन&lt;br /&gt;वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी&lt;br /&gt;वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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मैने मेरे बचपन के ग्रीष्मावकाश के बारे में लिखना शुरू किया था, &lt;a href="http://chhaya-e-shadow.blogspot.com/2006/07/i.html"&gt;उससे &lt;/a&gt; आगे-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता के शिक्षा के क्षेत्र में होने का लाभ यह था कि कि ग्रीष्मावकाश उन्हे भी मिलता था, ३० अप्रैल के बाद हम सपरिवार निकल पडते दादा दादी, नाना नानी के घर एक - दो महीने के लिये। सामान बांधा जाता। हम भारतीय रेल के सामान्य श्रेणी के डब्बों में बैठ निकल पडते। जब तक मै स्कूल में पढा, हर साल उन्ही दिनों मैने साल दर साल कई रेल यात्रायें की हैं। रेल यात्राओं का असली आनन्द तो वही था। भीषण गर्मी, लेकिन परिवार का साथ, घर का बना ही खाते पीते, कई बार आवश्यकतानुसार हम रेल भी बदलते, साथ में होती, रेल्वे स्टेशन से खरीदी गई कुछ पुस्तकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट्रेन की खिडकी पर बैठने को लेकर मारामारी होती। और खिडकी मिले या न मिले पुस्तक के समाप्त होते ही हम बस खिडकी से बाहर देखते रहते घण्टों चलती हुई रेल में बैठे, बिजली के तारों को, खेत, खलिहान, पर्वत, पठार, मैदान, पीछे छूटते स्टेशन, पटरियों के किनारे बनी झोपडियां और उनमें रेल के अस्तित्व से बेखबर लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में, सुरंग, पुल, नीचे भागता दौडता शहर, रेल-क्रोसिंग (इंतजार में रुके बेचैन लोग), नदियां, नहरें, आस पास से गुजरती दूसरी ट्रेनें, कल-कारखाने, कुल मिलाकर जिंदगी के भागते दौडते रूप एक बच्चे की आंखों में उतरते जाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दादा दादी का घर या नाना नानी का घर किसी जन्नत से कम नही था। जिसमें स्नेह ही स्नेह था, बोली में, कार्य व्यवहार में, जैसे पूरा वातावरण ही चाशनीमय था। एक अलग ही दुनिया। एक और छोटे कस्बे में स्थित दादा दादी के घर में जाने के बाद नदी में नहाना, खुले मैदानों में भागना दौडना, खेतों में जाना, जंगली जानवरों और सांपों से परिचय होता। सच्चे अर्थों में हमारा पढाई की दुनिया छोडकर असली दुनिया से परिचय वहीं होता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां पढने के लिये मिलता हमें धार्मिक साहित्य। रामायण, महाभारत और कल्याण की कुछ प्रतियां। कभी कभी हमें पुरानी दीमक चाटी हुई सरिता, मुक्ता, कादंबिनी, सारिका या धर्मयुग की कुछ प्रतियां मिल जाती और हम खोये रहते उन पुस्तकों में। कमलेश्वर, रवीन्द्र कालिया और मोहन राकेश की कहानियां, उनकी पत्नी अनीता औलक के आत्मकथात्मक धारावाहिक "चंद सतरें और" के कई भाग मैने पढे हैं। बहुत छोटी उम्र में बहुत बडे बडे लेखकों के कृतित्व से परिचय हो गया था। वहीं कहीं श्रीलाल शुक्ल जी के किसी रिश्तेदार के घर मुझे "रागदरबारी" मिल गई थी, जिसे मैने कुछ दिनों में ही चाट डाला था। रागदरबारी मैने उसके बाद फिर कई बार पढी और हर बार थोडा थोडा करके उसे समझ सका। मै उसे व्यंग्य की दुनिया का शिरोमणि ग्रन्थ मानता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद है, जब भारत ने क्रिकेट विश्व-कप जीता था १९८३ में, मई-जून ही था और मै मेरे दादा दादी के घर पर ही था। कैसे लोगों में क्रिकेट का जुनून सा छा गया था और पिता व उनके कई मित्रों में कई दिनों तक उसी की चर्चायें हुआ करती थी। उस अवसर पर खरीदी गई क्रिकेट-सम्राट की प्रति मैने बहुत दिनों तक संजो कर रखी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने टेलीविज़न भी वहीं पर पहली बार देखा था। एशियाड के पहले तक तो रेडियो ही घर घर में छाये हुए थे। बहुत से कार्यक्रम हम रेडियो पर नियमित रूप से सुनते थे। उनमें से बी बी सी लंदन के समाचार और रेडियो सीलोन से शिवाका या बिनाका गीतमाला प्रमुख थे। अमीन सयानी की वह अमर आवाज आज भी मेरे कानों को गुंजित कर जाती है, "&lt;strong&gt;इस हफ्ते दो पायदान ऊपर चढकर पहले पायदान पर है वो गाना जो पिछले हफ्ते था तीसरी पायदान पर&lt;/strong&gt;"। मुझे मालूम नही पायदान कैसे निर्धारित किये जाते थे (शायद सुनने वालों के पत्रों या रिकार्डों की बिक्री से), लेकिन हर हफ्ते उत्सुकता होती थी, इस बार कौन सा गाना आयेगा पहले पायदान पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब दादा जी के एक पडोसी के घर टेलीविज़न आया तो हम बुधवार व शुक्रवार ८ बजे चित्रहार का इंतजार करते थे और रविवार को किसी पुरानी फिल्म का। चैनलों में केवल दूरदर्शन ही उपलब्ध था और "&lt;strong&gt;एक चिडिया अनेक चिडिया&lt;/strong&gt;" जैसे अनेक (झेलाऊ) कार्यक्रमों को भी हम लोग बहुत पसंद कर लिया करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगली बार अंतिम किश्त में मेरे नाना नानी के घर पर बिताई मेरी छुट्टियों के कुछ सुनहरे दिनों के बारे में&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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---------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;दो सरदार एक होटेल पंहुचे और चाय के साथ जेब से सैन्डविच निकाल कर खाने लगे।  "आप अपने खुद के सैन्डविच यहां नही खा सकते", होटेल मालिक ने विरोध किया। दोनों सरदारों ने तुरंत सैन्डविच बदल लिये।&lt;br /&gt;।---------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;जसमीत कौर ने अपने पति संता को टी वी के आस पास पागलों की तरह कुछ ढूंढते हुए देखा।&lt;br /&gt;जसमीतः "क्या खो गया"&lt;br /&gt;संताः "मै देख रहा हूं कि कैमरा कहॉ छुपा रखा है इन लोगों ने"&lt;br /&gt;जसमीतः "कैमरा, किसने, तुम्हे कैसे लगा कि कैमरा है"&lt;br /&gt;संताः "अरे उन्हे कैसे पता कि मै क्या कर रहा हूँ"&lt;br /&gt;जसमीतः "किसे कैसे पता"&lt;br /&gt;संताः "अरे इन स्टार प्लस वालों को, वो महिला बार बार कैसे कहती है, आप स्टार प्लस देख रहे हैं, उसे कैसे पता चला?"&lt;br /&gt;-----------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;बंदर और गेंद&lt;br /&gt;-------------&lt;br /&gt;कुछ महाशय एक मधुशाला में बैठे बियर की चुस्कियां ले रहे थे। एकाएक एक महाशय एक बंदर के साथ वहाँ प्रविष्ट हुए। बंदर ने लोगों को तो परेशान नही किया, लेकिन वहाँ रखी वस्तुओं से छेडछाड करनी शुरू कर दी। उसके मालिक ने मधुशाला के कर्मचारियों को आश्वस्त किया "घबराइये नही, वैसे तो वह कुछ तोडेगा फोडेगा नही, ज्यादा से ज्यादा कुछ खा जायेगा, उसका पैसा मै दे दूंगा"। बंदर तीन चार बियर पी गया, प्याले तोडकर खा गया, ऐसा करके वह छोटा छोटा कुछ कुछ सामान खा गया। उसका मालिक मुस्कराता रहा, उसे आश्वस्त देख बाकी लोग भी निर्विकार भाव से बंदर को देखते रहे। अचानक बंदर को एक बडी क्रिकेट की गेंद मिल गई। इसके पहले कि कोई कुछ समझ पाता बंदर उसे भी गडप कर गया। खैर, उसका मालिक उठा, उसने पैसे दिये और रुखसत हुआ। लोगों ने भी चैन की सॉस ली। कुछ दिनों बाद वही महाशय उसी बंदर के साथ मधुशाला में हाजिर हुए। बंदर पुनः वस्तुयें निगलने लगा, लेकिन इस बार वह हर वस्तु को पीछे ले जाकर पहले पीछे से अंदर डालता, फिर खाता। लोगों को कौतूहल हुआ। उनके सवाल का जवाब देते हुए बंदर के मालिक ने बताया "जब से उसे वह गेंद निकालनी पडी, वह हर वस्तु को खाने से पहले उसका पहले पीछे ले जाकर माप लेता है, फिर खाता है"।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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कि मैने कुछ अपमानजनक टिप्पणी की थी। जिदान साहब अल्जीरियाई मूल के मुस्लिम हैं, तो किसी ने अंदाजा लगाया कि उनकी नस्ल पर कुछ कहा गया। मै तो कहता हूँ अगर इनमें से एक बात भी सही है और उन्हे आतंकवादी, मॉ, बहन या नस्ल से संबंधित कुछ कहा गया तो मेटरज्जी को और भी ज्यादा पीटना चाहिये था, लेकिन मैदान के बाहर आकर। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो हर विश्व-कप में थोडा बहुत विवाद होते रहे हैं, चाहे वो रिवाल्डो का मैदान में "एक्टिंग" करके विरोधी खिलाडी को लाल पत्रक दिलवाना हो, यो बेचारे १९८६ विश्व-कप के सबसे अच्छे खिलाडी मेराडोना को पूरी तरह घेर कर, कई बार पटक कर १९९० के विश्व-कप में अपंग जैसा कर देना हो। इसी विश्व-कप में कुछ मैच देखते हुए मुझे लगा कि जैसे मै युद्ध होता हुआ देख रहा हूँ। इटली और यू एस ए का मैच इसका एक उदाहरण था, जिसमें तीन खिलाडियों को लाल पत्रक (रेड कार्ड) से सम्मानित किया गया। मैदान में एक खिलाडी की आंख के पास से झर झर बहता हुआ खून भी दृष्टिगोचर हुआ और कुछ हाथापाई भी। वहीं दूसरी ओर पुर्तगाल और नीदरलैण्ड का मैच इस हाथापाई की पराकाष्ठा था, जहॉ चार खिलाडियों को लाल पत्रक सम्मान प्राप्त करने का गौरव हासिल हुआ। एक अकेले इस मैच में सत्रह पीत पत्रक (येलो कार्ड) दिये गये। पुर्तगाल की टीम तो पूरे टूर्नामेण्ट में २५ पीत पत्रक (येलो कार्ड) प्राप्त कर एक अनूठे सम्मान की हकदार बनी। उनके कृत्य की महानता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि दूसरे स्थान पर आई टीम उनसे बहुत बहुत पीछे रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी मुझे लगता है, इन सब खिलाडियों को फुटबाल के साथ साथ "एक्टिंग" की ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे एक पल पहले दर्द से तडपता सा खिलाडी विपक्षी खेमे को पत्रक मिलते ही, या रेफरी के "कुछ नही" कहते ही तुरंत फुरत उछल कर खडा हो जाता है। आपको याद होगा मैदान पर मृतप्राय पडे मेटरज्जी रेफरी द्वारा जिदान को लाल पत्रक दिखाये जाते ही कैसे उछल कर खडे हो गये थे, और हों भी क्यों ना, उद्देश्यप्राप्ति जो हो गई थी। मुझे विश्वास है भारतीय खेल मंत्रालय बहुतेरे सरकारी मंत्रालयों की तरह सोया नही पडा है और यह बात बराबर उसके ध्यान में है कि भारतीय टीम को भी अगले विश्व-कप के क्वालीफायर मैचों के पहले किसी ऐसे भारतीय अभिनेता से प्रशिक्षण दिलाना होगा, जिन्होने फिल्मों में मरने के सर्वाधिक दृश्य किये हों, अरे भाई प्रशिक्षण भी तो दर्द से तडपने का या मृतसमान पडे रहने का देना होगा ना। अब मुझे तो किसी अभिनेता का नाम याद नही आ रहा, अमरीश पुरी तो रहे नही, आप ही बताइये ऐसे किसी अभिनेता का नाम। वैसे अभिनेता न मिले तो नेता से भी काम चल जायेगा। "एक्टिंग" का ककहरा तो वो भी पढा ही देगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुनश्चः और अंग्रेजी वाले बोलते हैं जिदान ने "हेड बट्ट" कर दिया, मेरी तो समझ से बाहर की बात है, अगर हेड किया तो बट कैसे किया, अगर बट किया हेड कैसे किया, खैर आपको समझे तो बताना भाई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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असल में मैने गैर भारतीयों, खासतौर पर विकसित देशों के निवासियों में, यह बहुत देखा है, दिल की सुनते हैं, नौकरी वगैरा की चिन्ता नही करते ज्यादा। असल में सब जगह काम करने वालों की कमी है, तो जॉब सेक्योरिटी की चिन्ता तो होती नही ज्यादा। हम भारतीय कर सकते हैं ऐसा क्या? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमेरिका में अस्थाई कर्मचारियों को कान्ट्रेक्टर कहा जाता है। बहुत से लोग स्थाई नौकरी का प्रस्ताव होते हुए भी कान्ट्रेक्टर बने रहना पसंद करते हैं। कान्ट्रेक्टर इम्प्लाई को पैसा ज्यादा मिलता है और कम्पनियों के लिये भी फायदे का सौदा। हायर एण्ड फायर। आजकल सुना है भारत भी पँहुच रही है हायर एण्ड फायर की नीति। नियमित कर्मचारी हमेशा अपने आपको कान्ट्रेक्टर से श्रेष्ठ मानते हैं। आपको आश्चर्य होगा कि बहुत से भारतीय भी जब नियमित कर्मचारी बन जाते हैं, तो अपने ही देश वाले कान्ट्रेक्टर से अपने आपको श्रेष्ठ समझते हैं और थोडा रुतबा बना कर चलते हैं। कुछ हद तक शायद ये ठीक भी है, क्योंकि बहुत से कान्ट्रेक्टर्स को तो बस अपना टर्म पूरा करके निकल लेने की गरज होती है और बाद में उनका किया धरा कर्मचारी ही संभालते हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इसके पहले एक अन्य सज्जन पिछले सप्ताह इस्तीफा देकर चले गये थे। वैसे कान्ट्रेक्टर ही थे। उन्होने बताया वो दस महीने काम करते हैं, फिर उसके बाद कुछ आठ या दस महीने किसी और गरीब देश जाकर रहते हैं, जैसे इक्वेडोर या ब्राजील। कोई कन्या पसंद आई तो शादी वगैरा भी कर लेते हैं। अब तक शायद दो चार कर भी चुके हैं। पैसा खत्म तो वापस काम पर अमेरिका में। पैसा है जेब में जब तक, दुनिया घूमते रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो मुझे आदत पड गयी है, पर पहलेपहल बहुत आश्चर्य होता था। एक सज्जन सप्ताहांत में हर्ले डेविडसन दौडाते हैं, बहुत बडे समूह के साथ, उम्र है ७० वर्ष, और प्रोजेक्ट मैनेजर (कान्ट्रेक्टर) हैं। एक स्काई डायविंग करते हैं। एक तो बाकायदा प्रोफेशनल मेराथन दौडते हैं, उसके लिये कई देशों की यात्रा करते रहते हैं, बाकी समय में हमारे साथ काम करते हैं। ये लोग कितनी जिंदगियाँ एक साथ जी लेते हैं, और गजब की जीवटता और समर्पण है अपनी रुचियों हॉबियों के लिये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिनों पहले एक और अविवाहित महिला ने इस्तीफा दे दिया था। कारण कुछ दिन आराम से घर पर रहेंगे, फिर घूमेंगे घामेंगे, इच्छा हुई तो वापस आयेंगे, नही तो नही। वाह साहब क्या अंदाज हैं जीवन जीने के। सरकार भी काफी बेरोजगारी भत्ता दे देती है, नौकरियां भी बहुत सी हैं, चिन्ता किस बात की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन से सुना है, नौकरी, नौकरी और नौकरी। पढो नही तो नौकरी नही मिलेगी। अंग्रेजी सीखो नही तो नौकरी नही मिलेगी। एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के हर बच्चे के दिमाग में यही बैठा दिया जाता है कि नौकरी ही सब कुछ है। नौकरी ही भगवान है। किसी भी अन्य विकासशील देश की तरह ही भारत में फैली बेरोजगारी युवाओं को और कुछ सोचने या करने के लिये प्रेरित नही कर पाती। अपने आप को एक अदद नौकरी के लायक बना लो और जब मिल जाये तो करते रहो जीवन भर। लगी लगाई नौकरी छोडने वाला तो निरा बेवकूफ ही माना जायेगा भला। छोडना चाहे तो भी घर वाले या तो उसे किसी दिमागी दवाखाने में भर्ती करा देंगे या मना लेंगे कि ना छोडे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब सुनील जी ने &lt;a href="http://kalyanvarma.net/photoblog/"&gt;कल्याण वर्मा &lt;/a&gt;के बारे में लिखा तो मैने उनके बारे में पढा। अच्छा खासा कैरियर दॉव पर लगा वर्मा जी ने वन जीवन फोटोग्राफी अपनाई और अब उसमें भी सफल हैं। पर हममें से कितने लोग ऐसा कर पाते हैं? कितने ही सपने अधूरे रह जाते हैं हमारी आँखों में, और हम उन्हे कभी पूरा कर नही पाते। शायद हम ऐसा बिंदास जीवन नही जी सकते। जो मन आया किया, जो मन आया घूमा, जिससे मन आया शादी की, मन आया छोड दिया। हम जीते हैं जीवन बंध के, नियम से, कायदे से, कानून से, शायद इसीलिये हम भारतीय ज्यादा सफल हैं। कुछ खोते हैं कुछ पाते हैं। पर इन्हे बिंदास जीवन जीते देख कभी कभी एक कसक तो उठती ही है मन में। इसी का नाम तो है जिंदगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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जीवन'/><author><name>ई-छाया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15074429565158578314</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-26625939.post-115212908932523986</id><published>2006-07-05T12:44:00.000-07:00</published><updated>2006-07-05T14:56:33.650-07:00</updated><title type='text'>देसी मनों की दहशतें</title><content type='html'>मेरे जैसे अमेरिका में रहने वाले "सीधे सादे" देसी दो चीजों से बहुत डरते हैं। एक तो है, ९११ और दूसरा है फायर अलार्म। अरे कुछ पूडी पराठे छोले शोल्ले बनाने शुरू किये कि फायर अलार्म बजना शुरू। जान की साँसत है ये। आजकल तो मेरा काम यह होता है कि जब भी धर्मपत्नी को कुछ मसालेदार या धुंएदार बनाना हुआ तो बस फायर अलार्म को कुछ समय के लिये टेम्परेरिली "निपटा" देता हूँ (बैटरी को निकालकर)। अगर कभी चूक गया और वह शैतान का नाना बज गया तो तुरंत खिडकी दरवाजे खोलकर धुंए मियाँ को बाहर का रास्ता दिखाना पडता है। यह फायर अलार्म बडी खतरनाक प्रकृति की बला है। ज्यादा देर बजते रह गया तो पूरी बिल्डिंग में बजने लगता है, और अगर थोडी देर में उसे चुप न कराया तो सीधे फायर ब्रिगेड या पुलिस को सतर्क कर देता है। एक बार पुलिस घर आई, तो है तो वो पुलिस ही ना (किसी भी देश की हो, भैया, थाना पुलिस से तो भगवान ही बचाये), एकाध बार चेतावनी देकर छोड देती है, पर कभी जुर्माना भी कर जाती है (जो कि जाहिर है डालर में ही होता है, तो बडा अखरता है)। यही कारण है कि ज्यादातर "सीधे सादे" लोग फायर अलार्म से बहुत घबराते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;९११ की तो महिमा ही अपरंपार है। धोखे से भी फोन पर दब गया तो हजारों बार सफाई देते फिरो कि अरे बाबा, दब गया था धोखे से। ९११ अमेरिका में आपातकालीन सेवाओं के लिये दबाया जाने वाला नंबर है, जो एक आपातकालीन सेवाकेंद्र द्वारा पुलिस, फायर ब्रिगेड और/या एंबुलेंस को आपके पते पर पँहुचने के लिये तुरंत क्रियाशील कर देता है। विद्यालय में बहुत छोटी कक्षाओं में छोटे बच्चों को सिखाया जाता है, कि कोई मुसीबत आने पर तुरंत ९११ डायल करें। मुसीबत की परिधि या परिभाषा में बेचारे माँ बाप भी आते हैं। बेचारे माँ बाप डर डर कर जीते हैं, कहीं जोर से डांट दिया बच्चे को, और उसने डायल कर दिया यह शैतानी नंबर, तो पड जायेंगे लेने के देने भैया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों मेरे एक मित्र ने न जाने कैसे ये कारनामा कर दिखाया। शायद गलती से ९११ दब गया। आपरेटर से बात होने पर भाई ने बडी कोशिश की समझाने की, कि गलती से दब गया है, और सब कुछ वाकई में ठीकठाक है। आपरेटर ने सहमत होते हुए फोन तो रख दिया लेकिन थोडी ही देर में बंदे के घर के दरवाजे पर पुलिस का एक छः फुटा लंबा तगडा जवान नमूदार हुआ, जिसने घर में बाकायदा झाँककर, और घर में मौजूद छोटी बच्ची से पूछकर तसल्ली की कि "वाकई" सब ठीक ही है, तब जाकर रुखसत हुआ। मित्रवर कह रहे थे, मेरी तो इच्छा हो रही है, क्विकफिक्स लगा कर ९ और १ वाली की को जाम कर दूँ टेलीफोन पर। ना कभी दबेगी ना मुसीबत आयेगी। पर क्या करूं दिल्ली (घर) का कोड ११ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं एक दूसरे मित्र ने एक बार रात में सीने में भयानक दर्द होने पर हडबडा कर ९११ की शरण ली। हुआ कुछ यूँ कि जनाब डिस्कवरी चैनल पर कोई हृदय की शल्यचिकित्सा से संबंधित कार्यक्रम देख रहे थे, तो उन्हे दर्द उठा तो उन्हे लगा हो न हो ये हृदयाघात ही है। आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं से युक्त सायरन बजाती एंबुलेंस हाजिर हुई और जनाब को एक अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में थोडी देर तरह तरह के परीक्षण किये गये और बाद में जब ये पुख्ता हो गया कि ये और कुछ नही केवल "गैस" है, तभी जाकर दवाई दी गई। सुबह तक बंदे को छोड दिया गया। बेचारा असली बीमार तब हुआ, जब आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं का लंबा चौडा बिल उसे भेजा गया। अब वो तो इन्स्योरेंस था (अब अमेरिका में सभी का होता है,नही तो चिकित्सा सुविधाओं का बिल देखकर कितनों को रोज हृदयाघात हो जाय) तो जनाब २०० डालर देकर छूट गये। मर गई होगी बेचारी इन्स्योरेंस कंपनी। बहरहाल हम सभी ने उन्हे डिस्कवरी चैनल के चिकित्सा कार्यक्रमों से परहेज की सलाह दे डाली है। अब इन्स्योरेंस कंपनी को मालूम होता तो वो एक्सक्लूज़न या राइडर जोड देती उनके इन्स्योरेंस में, कि अगर आप डिस्कवरी चैनल देखकर बीमार "महसूस" करें और आपातकालीन सेवायें प्राप्त करें, तो कृपया इन्स्योरेंस कंपनी को माफी दें।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों न्यूयार्क में हुई एक घटना में, एक पाँच छः साला बच्चे की माँ को दिल का दौरा पडने पर उसका आकस्मिक देहांत हो गया, और बच्चे ने जैसा सिखाया गया था, ठीक वैसा ९११ घुमा दिया। झल्लाई हुई आपरेटर ने बार बार कहा, बच्चे खेल बंद करो, माँ से बात कराओ। बच्चा बेचारा सच बोलता रहा, मां मर चुकी है। आपरेटर ने सोचा ये मजाक कर रहा है। पाँच छः घष्टे बाद पिता के आने पर ही कुछ हो सका। लेकिन पिता ने ऊपर शिकायत कर दी, और उस आपरेटर पर विभागीय कार्रवाई हुई (कम से कम समाचार में तो ऐसा ही बताया गया)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर के दो ९११ की घटनाओं में अजीब असमानता है। जहां एक ओर सब कुछ ठीक होने पर भी पुलिस घर भेज दी गई, वहीं दूसरी घटना में जरूरत होने पर भी कुछ नही किया गया। इसे कहते हैं "ह्यूमन एलीमेण्ट" यहाँ आपरेटर का निर्णय काम आता है। क्या करें वो भी तो इन्सान हैं। हमारे फोन के बिल से एक दो डालर की राशि अनिवार्य तौर पर इस ९११ की (अ)सुविधा के लिये कटती है। देसी मन है, और बचपन की देसी यादें अभी तक हैं जब वक्त जरूरत होने पर हम केवल "गोहार" लगाते थे और सारा मोहल्ला या गाँव जमा हो जाता था मदद के लिये। चाहे कोई बीमार हो या आग लगी हो या चोर चकार घुस आया हो। भारत में अभी भी यह पद्धति जीवित है, लेकिन आत्मकेंद्रित अमरीकी समाज में यह 911 सुविधा शायद जरूरी है और काम की भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमीन।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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नामक तत्व की परिकल्पना की होगी, तब उसके पीछे यह सतत् छाई निष्क्रियता या बोझिलता को भंग करने का विचार उसके मन में रहा होगा। खैर, अब तो हालात यह हैं कि &lt;a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj"&gt;अनुगूंज&lt;/a&gt; भी बहुत से दिग्गजों को क्रियाशील नही कर पाती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब चिठ्ठाकारी में नया नया आया था, तब मुझे इसके इतिहास या भूगोल के बारे में ज्यादा ज्ञान न था, पर धीरे धीरे मुझे पता चला कि अतीत में बडे बडे चिठ्ठाकार हो गये हैं, जो अब नही लिखा करते। थोडा दुःख हुआ, हम उनके समकालीन होने से वंचित हो गये। न लिखने के बहुत से कारण हो सकते हैं, कुछ मजबूरियां हो सकती हैं, समय का अभाव, संसाधनों की कमी, अरुचि हो जाना आदि आदि, ये बेहद व्यक्तिगत मामला है, और अपनी अपनी मर्जी है, कोई किसी का दवाब तो है नही। मर्जी आये लिखें न मर्जी आये ना लिखिये भाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी खुश होता था कि एक दिन मै भी ऐसे ही विरक्ति होने पर चिठ्ठाकारी से सन्यास ले सकता हूँ, यानी वापसी के रास्ते खुले हैं। भूमिगत (अरे अंडरवर्ल्ड भाई) अपराधों की दुनिया की तरह ये ऐसी दुनिया नही, जहाँ आप प्रवेश तो कर सकते हैं, पर बाहर नही जा सकते, नो वन वे ट्रैफिक।&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;&lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/"&gt;फुरसतिया जी&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://www.hindini.com/ravi/"&gt;रवि जी&lt;/a&gt; एवं &lt;a href="http://www.blogger.com/profile/9937770"&gt;सुनील जी&lt;/a&gt; बेहद सक्रिय चिठ्ठाकार ठहरे। जाहिर है बाकी का चिठ्ठाजगत उनके कदम से कदम नही मिला पाता। &lt;br /&gt;रवि जी तो बेचारे अपने रास्ते &lt;a href="http://www.hindini.com/ravi/"&gt;चलते रहते हैं&lt;/a&gt;, लिखते रहते हैं, बदस्तूर लिखते रहते हैं, और फिकिर नॉट टाइप से लिखते जाते हैं, कोई ज्यादा सरोकार नही रखते कि बाकी का चिठ्ठाजगत क्यों निष्क्रिय पडा है। सच्चे मायनों में "कर्म किये जा फल की चिन्ता मत कर" टाइप। वैसे &lt;a href="http://desh-duniya.blogspot.com/2006/06/blog-post_26.html"&gt;सुना है&lt;/a&gt;, उन्हे कोई &lt;a href="http://www.bhashaindia.com/contests/iba/Winners.aspx"&gt;इनाम विनाम&lt;/a&gt; मिला है, तो कुछ फल तो मिल गया है। पता नही इसकी चिन्ता उन्हे थी या नही, अब ये तो वे ही बेहतर बता पायेंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनील जी, नियमित &lt;a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/2006/06/blog-post_26.html"&gt;लिखते&lt;/a&gt; हैं, और हिंदी चिठ्ठाकारी के बेशकीमती रत्न हैं। उनके देश-विदेश के प्रवास अनुभव, बेबाक लेखन और बेहद ईमानदारी से लिखना ही ये कारण है, कि मै उनका हर चिठ्ठा पढता हूं। सुनील जी, कभी कभी अनजाने में इस शान्त पडे तालाब में पत्थर मार देते हैं, जैसे "&lt;a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/2006/05/blog-post_18.html"&gt;आपने अपने सपने पूरे किये या नही&lt;/a&gt;"। बहुत दिनों तक दिलोदिमाग पर छाया रहा ये वाक्य, &lt;a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=75"&gt;कुछ लोगों&lt;/a&gt; ने तो लिख भी डाला। बहुत कोशिश की कि मै भी लिखूँ, लेकिन वही ढाक के तीन पात.........। वैसे &lt;a href="http://desh-duniya.blogspot.com/2006/06/blog-post_26.html"&gt;सुना है&lt;/a&gt; कि सुनील जी को भी &lt;a href="http://www.bhashaindia.com/contests/iba/Winners.aspx"&gt;इनाम&lt;/a&gt; मिला है। वाह भाई वाह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहे &lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/"&gt;फुरसतिया जी&lt;/a&gt;, तो मै उन्हे हिंदी चिठ्ठाजगत का आधारस्तंभ मानता हूँ। शायद ही कोई हिंदी चिठ्ठा हो, जहाँ उनकी पँहुच न हो। सबसे ज्यादा चिठ्ठाकार अगर जुडे हैं तो फुरसतिया जी से। सबसे ज्यादा टिप्पणियाँ मिली होंगी तो उन्हे और अगर की होंगी तो उन्होने ही, और शायद सबसे ज्यादा चिठ्ठाकार मिलन फुरसतिया जी ने ही किये होंगे। बेहद लंबे लेख, मगर मजाल है कि पकड छूटने पाये कहीं। किसी ने कुछ फरमाइश की, कि बेचारे फुरसतिया जी, रातों की नींद उडाकर भी &lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=143"&gt;पेश करते हैं&lt;/a&gt; अपने चिठ्ठे पर। मुझे आश्चर्यमिश्रित दुःख हुआ, जब मैने पाया कि चिठ्ठाजगत के इस पुरोधा को पुरस्कार नही मिला। खैर ......... अब उस पर तो अपना बस नही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में फुरसतिया जी ने एक बार फिर इस शान्त पडे तालाब (जो कुछ नियमित लेखकों के देसगमन के कारण और उदास सा हो गया था) में पत्थर फेंक दिया "&lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=147"&gt;अमेरिका और उसके मिथक&lt;/a&gt;"। तालाब में हलचल मच गई, कुछ रुकी पडी लेखनियॉ हरकत में आ गईं। बात किसी एक स्टूपिड से (माफ करियेगा इसे हिंदी में नही लिख रहा क्योंकि मूर्ख लिखने से ज्यादा रस इस शब्द में है) सर्वे से शुरू हुई और ना जाने कहॉ से कहॉ पंहुच गई। मैने सोचा कुछ लिखुंगा, फिर जब कुछ लेख पढे, सोचा नही लिखुंगा, बहरहाल इस कशमकश में कुछ समय गुजर गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने सोचा नही लिखुंगा, जा, क्या होगा, अगर आपने किसी चार-पॉच वर्षीय बालक या बालिका के पिता होने का सौभाग्य प्राप्त किया है, तो आपको पता होगा कि आप उसे जो भी करने को कहते हैं, वो सदैव उसका विपरीत ही करता या करती है। एक विरोधी मानसिकता, परंपराओं को तोडने की आकांक्षा। बचपन से मै किसी भी प्रकार के असाइनमेंट assignment (माफ करें समझ नही आ रहा उपयुक्त हिंदी शब्द) से चिढता रहा हूं। खुद की मर्जी आये तो ही करूंगा लेकिन कोई और मुझे करने को मज़बूर करे, जहां तक हो सके नही करूंगा, कत्तई नही करूंगा जी। कालान्तर में अभियांत्रिकी एवं मैनेजमेंट के अध्ययन के दौरान मुझे इस विरोधी विचारधारा को तिलांजलि देनी पडी। असाइनमेंट पर ही तो आधे नंबर होते हैं साहब। करो नही तो घर बैठो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुरू में मुझे &lt;a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj"&gt;अनुगूंज&lt;/a&gt; ऐसा ही असाइनमेंट लगा। लेकिन अब नौकरी कर कर के असाइनमेंट से चिढ अगर भागी नही तो कम जरूर हो गई है, तो कभी फुरसत के वक्त लिख ही डाला। सुनील जी का सपनों पर लिखने का &lt;a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/2006/05/blog-post_18.html"&gt;आमंत्रण&lt;/a&gt; और अब ये फुरसतिया जी का अमेरिकी चिठ्ठाकारों को &lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=147"&gt;खुली ललकार&lt;/a&gt; असाइनमेंट ही है हमारे लिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल इधर उधर की बातें छोडकर अब मुद्दे पर आता हूँ। कृपया ये बिलकुल न समझा जाये कि ये पूरे हिंदी चिठ्ठाजगत के विचार हैं या सारे अमेरिकी चिठ्ठाकारों के विचार हैं या सारे प्रवासी भारतीयों के विचार हैं। एक बेहद सीमित बुद्धि के नाचीज़ इन्सान के विचार माने जायें, जिसने अमेरिका में थोडा वक्त ही बिताया है, और जो अपने सीमित ज्ञान के आधार पर इस विषय पर कुछ लिखने का दुस्साहस कर रहा है। मैने मूल विषय पर तो कुछ ना लिखने का फैसला किया है, क्योंकि इतना दुस्साहस मै नही कर पाया, पर मेरे सीमित निजी अनुभव के आधार पर मै फुरसतिया जी के लेख पर श्रीमान् हिंदी ब्लोगर महोदय की &lt;a href="http://hindini.com/fursatiya/?p=147"&gt;टिप्पणी में उठाये प्रश्नों&lt;/a&gt; का उत्तर देना चाहूंगा (गलतियों के लिये पहले ही क्षमायाचना)।&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हमारे ब्लॉगरों में से ज़्यादातर अमरीका में हैं. वो हमें बताएँ कि अमरीका में स्ट्रीट क्राइम की स्थिति भारत से बुरी है कि नहीं?&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;अजी बिलकुल नही जी, भ्रम की दुनिया छोड हकीकत की दुनिया में कदम रखिये। भारत से बुरी तो कदापि नही। कुछ महानगरों में होते हैं स्ट्रीट क्राइम, पर नियंत्रण में, ज्यादातर शहर शान्त एवं सुरक्षित हैं, जहॉ एकाकी स्त्रियां या पर्यटक भी बेधडक रात्रि विचरण कर सकती हैं। मत भूलें कि अमेरिका पचास राज्यों का देश है, केवल कुछ महानगरों का नही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जघन्य अपराधों के मामले में अमरीका को भारत से ऊपर रखा जा सकता है या नहीं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भारत से ऊपर, किस आधार पर। नरबलि यहां नही होती, हर दिन में सैंकडों बलात्कार यहां नही होते। केवल जाति या धर्म के आधार पर सौ पचास लोग पलक झपकते ही हलाल नही किये जाते यहॉ। ऐसा नही कि जघन्य अपराध नही होते यहां, पर अपराधी खुले नही घूमते या संसद/विधानसभा में नही बैठते।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वहाँ पारिवारिक समस्याएँ भारत से ज़्यादा हैं या नहीं?&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;हैं, ज्यादा हैं, व्यक्तिवाद है। लोग एक ही शादी निभाने को बाध्य नही। नापसंद होने पर अलग हो जाते हैं। इसका बच्चों पर बुरा असर पडता है। वृद्धों को अधिकतर अकेले ही रहना पडता है। बहुत से युवा भी अकेले रहते हैं। एकाकीपन को मिटाने के लिये लोग कुत्ता बिल्ली पालते हैं, और उन्हे बच्चों से ज्यादा प्यार देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अमरीका में अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई भी भारत के मुक़ाबले बड़ी है कि नहीं? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नही, ये भारत के समान है। सरकार अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाती है, गरीबों को छूट देती है, भत्ते भी देती है। सभी टैक्स भरते हैं, भारत में धनी किसान भी टैक्स नही भरते, केवल नौकरीशुदा मारे जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक आम अमरीकी एक आम भारतीय के मुक़ाबले ज़्यादा स्वार्थी है कि नहीं?&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;स्वार्थी की परिभाषा क्या है? क्या सडक पर थूकना, या कचरा गंदगी फैलाना स्वार्थीपन नही। किसी का कॉच का घर बना देखकर और घर में किसी को न देखकर पत्थर मारना स्वार्थीपन नही। स्वार्थी से मतलब अगर आत्मकेंद्रित से है, तो हाँ एक आम अमरीकी एक आम भारतीय के मुक़ाबले ज़्यादा आत्मकेंद्रित है। ज्यादातर लोग किसी के फटे में बेवजह टाँग नही अडाते। मांगो नही तो मदद् भी नही करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारत में आमतौर पर विदेशियों को (ख़ास कर गोरों को) जिस तरह इज़्ज़त दी जाती है क्या अमरीका में विदेशियों को (ख़ास कर भूरों को) उस दृष्टि से देखा जाता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ये पढकर कुछ देर तक मै हँसा। इज़्ज़त? किस इज़्ज़त की बात कर रहे हैं आप? भारत में लोग गोरों को पागलों की तरह आंखें निकालकर घूरते हैं। स्ट्रीट सेल्समैन उन्हे लगभग जबरदस्ती सामान टिकाने की कोशिश करते हैं। भिखारी रटारटाया "गिव मी वन डालर" अलापते हैं। किसी भी मदद के लिये बदले में डालर पाने की आकांक्षा लिये लोग आगे पीछे घूमते हैं। मौका पाने पर हर व्यक्ति लूटने की कोशिश करता है। क्या यह इज़्ज़त है? अमरीका में हम भूरों को ही क्यों ज्यादातर कालों को भी पूरा सम्मान मिलता है। कम से कम अधिकारिक तौर पर तो मिलता है। लोग अब भूरों को भी जानते हैं, जानते हैं कि उन्हे हमें और हमें उनकी जरूरत है। जानते हैं कि ज्यादातर भूरे ही संगणक के क्षेत्र में छाये हुए हैं। होंगी एकाधी जगहें, या कुछ प्रसंग, लेकिन अगर सम्मान से आपका मतलब अमरीकी भिखारियों के हमारे आगे पीछे घूमने से है, तो हाँ वो हमें यहां नही मिलता। फिर वो तो किसी को नही मिलता यहाँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै अमेरिका समर्थक नही, न ही कोई अमेरिकी प्रवक्ता हूं। लेकिन सच को सच कहना चाहता हूँ। और ये सब लिखने के बाद भी मै एक दिन अपने देश (भारत) ही वापस  जाना चाहता हूँ। ऊपर मैने केवल आपके सवालों का जवाब देने की कोशिश की है। अमेरिका के बारे में मेरे अन्य विचार आप &lt;a href="http://chhaya-e-shadow.blogspot.com/2006/05/blog-post_11.html"&gt;मेरे अनुगूंज के लिये लिखे लेख में पढ सकते हैं। &lt;/a&gt;मेरे विचारों से किसी को ठेस पंहुचे तो क्षमा करियेगा, ये सब लिखते हुए मुझे खुद भी शर्म आती है, पर यह एक कडवा सच है कि हम अमेरिका से बहुत पीछे हैं, और हमें उसकी बराबरी करने के लिये बहुत काम करना पडेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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(पुराने अंक पर क्लिक करें, और जून २००४ के बाद के अंकों का रसास्वादन करें)&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.vagarth.com"&gt;वागर्थ&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.tadbhav.com"&gt;तद्भव&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.hindinest.com"&gt;हिंदीनेस्ट&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.abhivyakti-hindi.org"&gt;अभिव्यक्ति&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.anubhuti-hindi.org"&gt;अनुभूति&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.srijangatha.com"&gt;सृजनगाथा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;समाचार पत्र&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.hindustantimes.com/news/2045_0,0100.htm"&gt;हिंदुस्तान टाइम्स&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://navbharattimes.indiatimes.com"&gt;नवभारत टाइम्स&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुछ अन्य&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/"&gt;बीबीसी हिंदी&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF"&gt;हिंदी साहित्य विकीपीडिया&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.bhashaindia.com/patrons/indicit/hindi"&gt;भाषाइंडिया&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.india-world.net/hindi/index.html"&gt;इंडियावर्ल्ड&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.wordpaint.com/index/hi.htm"&gt;वर्डपेन्ट&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.saraswatipatra.com/ "&gt;कनाडा का सरस्वती समाचार पत्र&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.webdunia.com/homepage/default.htm"&gt;वेबदुनिया&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कुछ रोचक अमेरिका प्रवास संस्मरण&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे ऊपर रखता हूँ हमारे साथी चिठ्ठाकार &lt;a href="http://lifeinahovlane.blogspot.com/"&gt;अतुल भैया के संस्मरण। &lt;/a&gt;मुहावरेदार भाषा के धनी अतुल जी का लच्छेदार कहानियाँ सुनाने में कोई सानी नही लगता।&lt;br /&gt;हिंदी की प्रख्यात लेखिका सूर्यबाला जी के वागर्थ में छपे &lt;a href="http://www.vagarth.com/march/suryabala/index.htm"&gt;संस्मरण&lt;/a&gt;। &lt;br /&gt;वागर्थ से ही कुछ और पढें &lt;a href="http://www.vagarth.com/december/pravas/index.htm"&gt;यहाँ&lt;/a&gt; या &lt;a href="http://www.vagarth.com/august/pravas/index.htm"&gt;यहाँ&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;और &lt;a href="http://www.hindinest.com/sansmaran/pehliraat.htm"&gt;ये पढें अमेरिका में पहली रात का किस्सा&lt;/a&gt; हिंदीनेस्ट से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पुस्तकों से जुडी कुछ यादें&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत पहले की एक घटना याद आ रही है। बहुत से साथी चिठ्ठाकारों की ही तरह मुझे भी बचपन से ही पढने का कीडा काट चुका था और जो कुछ भी हमारी सीमा में पढने के लिये उपलब्ध होता, जल्दी से चाटकर नये की तलाश शुरू कर दी जाती थी। बहुत छोटा था मै और गरमी की छुट्टियों में दादा दादी के घर गया था। एक दिन महाभारत हाथ लग गयी और फिर क्या था, बस मै और वो किताब। दीन दुनिया की खबर जाती रही। खाना खाया या नही खाया, कुछ याद नही रहता था। मेरे दादा जी पढने को बुरा नही मानते थे, पर वो ये मानते थे कि इतनी छोटी उम्र में इतना ज्यादा पढना ठीक नही, थोडा खेलना कूदना भी चाहिये। लेकिन अब साल में एक दो महीने ही हमें देख पाते थे, तो इस विषय पर नाखुश होकर भी कुछ बोलते नही थे। एक दिन पिता के बचपन के एक मित्र पधारे और दादाजी ने शिकायती लहजे में मेरा परिचय दिया "इतनी छोटी उम्र में महाभारत पढ रहे हैं", पिता के मित्र ने जो जवाब दिया, उसे मैने गाँठ बांध लिया, और वो था "बाबू जी पुस्तकों का सबसे बडा सौभाग्य यही है कि कोई उसे पढे, मनुष्य की सबसे बडी मित्र पुस्तकें ही हैं"। इस बात को मैने जीवन में बखूबी महसूस किया है, और मेरे अच्छे मित्रों को मै हमेशा अपने पास ही रखता हूँ। आशा है आप आनन्द उठायेंगे, इन खजानों का, जो हमें अन्तरजाल पर उपलब्ध हैं, और इन खजानों के होने का अर्थ ही यही है कि इन्हे पढा जाय गुना जाय।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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जाहिर है जो आपके ऊपर पैसा लगायेगा वो एक तरह का निवेश करेगा और बदले में आपसे कुछ चाहेगा। भारत के सभी बडे उद्योगपति इसी तरह से राजनीतिक दलों पर पैसा लगाते हैं, और समय आने पर वसूलते भी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत विश्व का सबसे बडा लोकतंत्र है। शायद सबसे सफल भी कहा जाता होगा लेकिन ढेरों विसंगतियां हैं। दूरदर्शी राजनीतिक दलों का अभाव है। जनता भी दूर का नही सोचती। आज भी वोट डलने से पहले कम्बल बँटते हैं, शराब का दौर चलता है, जीतने के बाद नेता पहले अपना घर भरते हैं, फिर समर्थकों में बंदरबाँट करते हैं। बहुत से ज्यादा समझदार लोग वोट ही नही डालते "सब के सब साले एक जैसे हैं, किसको वोट दूँ, कोई मेरे वोट के लायक नही है" या "एक हमारे वोट से क्या उखड जायेगा"।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज का ही &lt;a href="http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/1641602.cms"&gt;समाचार&lt;/a&gt; है। जब देश की आम जनता भीषण गरमी से जूझ रही है, हमारे नीतिनिर्धारक मय परिवार विदेश की ठंडी चरागाहों में बैठे हैं। हमारे आपके जैसे करदाताओं के कर का कितना सही उपयोग करते हुए। समाचार के अनुसार वाम समर्थित काँग्रेस सरकार के ग्यारह केंद्रीय मंत्री विदेश में हैं। इनमें से सोमनाथ चटर्जी सहित कई तो विश्व कप फुटबाल देखने जरमनी में हैं। यही लोग हैं जो कल आपको आम आदमी का दुखडा रोते नज़र आयेंगे संसद में। &lt;strong&gt;आम आदमी मतलब वो आदमी जिसके पास वोट है, पर अकल नही है। उसे उल्लू बनाकर वोट निकलवाने का खेल ही राजनीति है। उल्लू बनाने वाला नेता है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज कितने ही उदाहरण भरे पडे हैं उन नेताओं के जिनके घर राजनीति में आने से पहले भूंजी भांग भी नही थी और आज छापों में करोडों निकलते हैं, या आज दिन का खर्च लाख रूपये है। जनता को भी आजकल कोई आश्चर्य नही होता। ये भी और "आम" समाचारों की तरह एक अदना सा समाचार है। दिन गया कि समाचार पत्रों से गायब हो जाता है और आम आदमी की स्मृति से भी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुनाव में धर्म चलता है, जाति चलती है। लोग भेड बकरियों की तरह केवल अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट देते हैं, योग्य हो या न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुनाव में लाठी भी चलती है। बाहुबली करें भी तो क्या, उनकी पहचान का और रोजी रोटी कमाने का सही वक्त है चुनाव। हमारे पडोस के जिले में एक राजा साहब चुनाव में खडे हुए थे, उनका वोट मांगने का तरीका अभिनव था। गाँव गाँव हाथी पर बैठकर गये और लोगों से पूछा "किसको वोट दोगे?", अब राजा साहब पूछ रहे हैं लोग क्या जवाब देंगे भला। सबने कहा "आपको सरकार"। "फिर ठीक है, मतदान केंद्र आने का कष्ट न करें, हम आपका वोट डाल देंगे"। और बस  चुनाव के दिन मतदान केंद्र खाली होते थे, लेकिन वोट पूरे सत्तर अस्सी प्रतिशत पड जाते थे, राजा साहब हमेशा जीतते रहे, जबतक कि एक दिन मौत उनसे न जीत गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपने सुना होगा भइया राजा का वो प्रचार गीत, उस समय बसपा का उदय नही हुआ था और निर्दलीय उम्मीदवार भइया राजा को पन्ना मध्यप्रदेश के पास के उनके एम एल ए के चुनाव के लिये हाथी का चुनाव चिन्ह मिला था।&lt;br /&gt;&lt;em&gt;मोहर लगेगी हाथी पर&lt;br /&gt;नही तो गोली चलेगी छाती पर&lt;br /&gt;और लाश मिलेगी घाटी पर।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;आज मुझे याद नही पडता कि वो जीते थे या हार गये थे, लेकिन ये चुनाव प्रचार का अनूठा तरीका अनेकों पत्र पत्रिकाओं में छाया रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फर्जी मतदान भारत के चुनाव का एक अभिन्न अंग है। जब आपकी पहचान अंदर बैठे हुए राजनीतिक दलों के एजेन्टों ने ही करनी है तो भाई वो भी तो मनुष्य ही हैं। मतदान सूचियों में गडबडियाँ भी अब हर चुनाव का एक हिस्सा हैं। जब लोगबाग समझाने से भी नही समझते, पूरे के पूरे कुनबों के नाम उडा दिये जाते हैं, "जाओ डालो वोट, बहुत शौक चढा था, उखाडो जो उखाडना है"।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुल मिलाकर राजनीति के शुद्धीकरण का रास्ता चुनाव सुधारों से शुरू होता है। जब तक चुनावों में जाति चलेगी, पैसा चलेगा, बाहुबल चलेगा और फर्जी मतदान चलेगा तब तक योग्य व्यक्ति राजनीति को एक गाली समझता रहेगा। जरूरत है ऐसे लोगों की जो देख सकें पार छोटे छोटे स्वार्थों के, जो पहचान सकें आने वाले समय की आहटों को, जो ले जा सकें भारत को अगली सदी में, जो ऊपर हों वोट बैंकों के गंदे खेल से। पर ऐसे लोग मिलेंगे कहां। शायद हमारे बीच ही, पर उनके लिये चुनाव जीतने और संसद तक जाने का मार्ग है चुनाव, और वो मार्ग हमें प्रशस्त करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस यहीं पर रुकता हूँ, लेख को ज्यादा बोझिल नही करता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टैगः &lt;a href="http://technorati.com/tag/anugunj" rel="tag"&gt;anugunj&lt;/a&gt;, &lt;br /&gt;&lt;a href="http://technorati.com/tag/अनुगूँज" rel="tag"&gt;अनुगूँज&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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अगर न करें तो जरूर कुछ असामान्य है, दोनों के बीच।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा कारण भारतीय स्टॉक मार्केट (मुद्रा बाजार कहेंगे क्या, माफ कीजियेगा अगर गलत हो) है, पहले तो गुब्बारे की तरह फूलता जा रहा था, बस फूलता जा रहा था। लोग खुश थे, कुछ जिन्होने पहले ही घबराकर शेयर बेच डाले, सर पीट रहे थे। ज्यादातर अकर्मण्य लोग बहुत खुश थे। शेयर वैल्यू दिनबदिन बढती जो जा रही थी। एकाएक पता नही क्या हुआ? दुनिया भर के बाजार क्या गिरे, भारत का भी धूल चाट रहा है। लोगों ने हजारों लाखों गँवा दिये। सरकार कहती है, म्यूचुअल फंड खरीदो, वो भी गिरे सब मुँह के बल। अब आजकल ये हाल है कि रोज सुबह ऊपर, शाम को गिर जाता है बाजार। मानों बाजार ना हुआ किसी दुकान का शटर हुआ। एक बेचारा आम आदमी जो हिम्मत करके किसी तरह पैसा लगाने को तैयार हुआ था, पुराने यू एस ६४ या केतन पारेख या हर्शद मेहता काल को भूलकर, फिर बिदक गया है। जिन्होने पैसे गवॉ दिये हैं उनके मन में अवसाद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मई जून का महीना बहुत सी भारतीय कम्पनियों में वार्षिक तनख्वाह वृद्धि या रेटिंग रिलीज़ होने का वक्त होता है। अब कम्पनियॉ भी क्या करें, फायदा भी तो कमाना है ना, शेयर होल्डर्स को भी जवाब देना है, और सबको तो अच्छी तनख्वाह वृद्धि दे नही सकते। बहुत से बेचारे लोगों को अच्छे काम (परफारमेन्स) के बावजूद कम तनख्वाह वृद्धि मिलती है और बॉस कहता है, तुम्हारा काम अच्छा है, पर क्या करूं यार, ऊपर से आदेश आया है। कई लोग अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बारिश जल्दी हो गई। किसान चिन्ताग्रस्त है, पता नही मानसून कैसा होगा। कुछ लोग कहते हैं जिस साल जल्दी बारिश हो जाये, मानसून अच्छा नही होता। कुछ लोग बारिश जल्दी होना अपशगुन मानते हैं। पहले ही लोग कर्जा ले कर बैठे हैं, हे भगवान अगर बारिश अच्छी न हुई तो क्या होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुम्बई-पूना के लोग घबराये बैठे हैं, भारी बारिश की भविष्यवाणी पिछले साल की दर्दभरी यादें वापस लाई है। पता नही सरकार ने कितना इंतजाम किया है। पर सरकारी इंतजामों का क्या भरोसा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहीं अमेरिका में तटीय क्षेत्रों के लोग घबराये हैं, वापस आ रहा है हरीकेन सीज़न यानी कि चक्रवातों का मौसम। कहीं न्यू ओर्लियोन्स की तरह कैटरिना की पुनरावृत्ति न हो जाये। सरकारी इंतजामों का भरोसा लोगों को यहॉ भी नही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरक्षण का क्या चल रहा है? पहले तो हडताल इतने दिनों तक क्यों चली? ऐसा क्यों है कि सरकार हडताली चिकित्सकों को मनाने में असफल रही। कोई भी राजनीतिक दल हडताली चिकित्सकों के साथ नही था। क्यों सर्वोच्च न्यायालय को आना पडा बीच में? अब किस किस चीज़ के लिये सर्वोच्च न्यायालय दखल देगा। क्या पहले ही उसके पास काम की कमी है। और अब निज़ी सन्स्थानों पर भी सरकार का आरक्षण लागू करने का दवाब। क्या बच्चों को कोई भविष्य मिल पायेगा। क्या अवसादग्रस्त होकर तो नही रह जायेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मई जून के महीने होते हैं भारत में करोडों छात्रों के परीक्षा परिणामों के आने के। कई प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे आई आई टी, पी ई टी, अभियांत्रिकी प्रवेश या मेडिकल प्रवेश) के नतीज़े घोषित होने का। हजारों हजार छात्र निराश हो जाते हैं, कइयों को समुचित मार्गदर्शन उपलब्ध नही होता। भविष्य अन्धकारमय दिखाई देने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खबरों में पढा, कुछ लोगों ने आरक्षण के चलते आत्मदाह की कोशिश की। ये भी पढा कि कुछ छात्रों ने परीक्षा परिणामों के अनुकूल न होने पर आत्महत्या कर ली। क्यों? अवसाद आता है, असहायता की स्थिति से। जब मन में ये विचार आये कि "क्या कर सकते हैं हम?"। जब कुछ अप्रिय हो रहा हो और हम कुछ कर सकने की अवस्था में न हों। जब चारों तरफ से बुरी ही बुरी खबरें सुनाईं दें। जब मन आशंकाग्रस्त हो। भविष्य अन्धकारमय दिखाई देने लगे। अवसादग्रस्त मनुष्य को सबकुछ अवसादमय दिखाई देता है और वो गाता है यह गीत "बागन में बगियन में बगरो अवसाद है, दुनिया फसाद है, सब बकवास है"।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मूलभूत कारण है, आशा। जी हॉ आशा ही निराशा का कारण है। आपकी आशाओं का पूरा न होना ही आपको अवसादग्रस्त बनाता है। निवेशक आशा करता है निवेश अच्छा होगा। विद्यार्थी आशा करता है परीक्षा परिणाम अच्छा होगा। चिठ्ठाकार आशा करता है चिठ्ठा लोग पढेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अवसाद अनुवांशिक (ज़ैनेटिक) भी होता है। कुछ लोग जल्दी अवसादग्रस्त हो जाते हैं, कुछ विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कराते हैं ( मन ही मन बुदबुदाते रहते हैं "सतयुग आयेगा - जयगुरुदेव")। आपके लालन पोषण पर भी निर्भर करता है कि आप कितनी जल्दी अवसादग्रस्त होते हैं। यदि बचपन से आपको बडे नाजों से पाला गया है तो विपरीत परिस्थितियों में आपके हाथों पैरों का जल्दी फूल जाना स्वाभाविक है। बचपन से विपरीत परिस्थितियों से लडने वाले बॉके शूर बहुत मजबूत होते हैं। उनके शब्दकोश में इस शब्द की कोई जगह नही होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप किसी भी मनोरोग विशेषज्ञ का उदाहरण ले लें। सबका धन्धा अच्छा चल रहा है। दुनिया में हर जगह मनोरोगियों की सँख्या दिनबदिन बढ रही है। नित नये नये मनोरोग सुनने में आते हैं। क्यों। कारण है, संयुक्त परिवार का विघटन। लोगों का आपस में कम मिलना जुलना। रिश्तों का टूटना। हर क्षेत्र में बढती प्रतिस्पर्धायें। बढती महत्वाकांक्षायें। हर किसी के पास सुनाने के लिये बहुत कुछ है, लेकिन सुनने वाला कोई नही। हर किसी के मन में भरी हुई है भडास, कहॉ निकालें। इस दुनिया में धैर्य रखकर सुनने वाला बहुत किस्मत वालों को मिलता है, नही तो हर व्यक्ति ऐसा कि "मैने तेरा झेला, अब तू मेरा झेल"। एक अच्छा मनोरोग विशेषज्ञ बहुत अच्छा धैर्य रखकर सुनने वाला होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे विचार से चिठ्ठाकारी इस मामले में अवसाद कम करने का बहुत अच्छा साधन है। आप अपनी सारी भडास यहॉ निकाल सकते हैं। बिन्दास। इस दुनिया में जहाँ लोगों से मिलना जुलना कम हो गया है, सम्वाद का यह जरिया अपने विचारों को व्यक्त करने का बेहद शानदार माध्यम है। दुःख ये है कि १२५ करोड की आबादी के हिसाब से अभी भी हिन्दी चिठ्ठाकारी बहुत पीछे है। एक पुरानी सुनी बात याद आ रही है।&lt;br /&gt;भारत में&lt;br /&gt;कोई भी समय चाय का समय होता है।&lt;br /&gt;कोई भी व्यक्ति चिकित्सक होता है (विश्वास न हो तो किसी को भी कोई बीमारी बता कर देखैं)&lt;br /&gt;कोई भी जगह प्रसाधनस्थल (या मूत्रालय) होती है।&lt;br /&gt;कोई भी व्यक्ति, किसी भी विषय पर कितनी ही देर तक बोल सकता है। अब देखिये मै ही कितना कुछ बोल गया ना अवसाद पर।&lt;br /&gt;तो अब बस करता हूँ। चिन्ता मत करें मै आपको धैर्यपूर्वक सुनने वाला नही मानता बल्कि "मैने तेरा झेला, अब तू मेरा झेल" वाले समूह का मानता हूँ। तो मेरा हो चुका और मै तैयार हूँ आप शुरू करें।&lt;br /&gt;आइये चिठ्ठाकारी बढायें और अवसाद को अलविदा कहें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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title='डालरनामाः महिमा हरे रंग की ( पुनः)'/><author><name>ई-छाया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/15074429565158578314</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-26625939.post-114783049813427138</id><published>2006-05-16T18:44:00.000-07:00</published><updated>2006-05-17T14:40:45.513-07:00</updated><title type='text'>डालरनामा - महिमा हरे रंग की</title><content type='html'>डालरनामा - महिमा हरे रंग की&lt;br /&gt;----------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जिन मित्रों ने मेरा उन्नीसवीं अनुगूंज को समर्पित इसके पहले की रचना (लेख) नही पढी, उनसे अनुरोध है कि वो इसे &lt;a href="http://chhaya-e-shadow.blogspot.com/2006/05/blog-post_11.html"&gt;&lt;em&gt;यहाँ&lt;/em&gt;&lt;/a&gt; जरूर पढें।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरा रंग, हरा रंग है पर्यावरणवादियों का। बेशक दुनिया में हरा रंग न हो तो कुछ भी न हो। पेड पौधे ही तो हमारी जान हैं। पूरी दुनिया अब शाकाहार की तरफ मुड रही है और हरितलवक अब हर स्वस्थ भोजन का हिस्सा है। तेजी से कम होते वन और ग्लोबल वार्मिंग (विश्व के बढते तापक्रम) पर पूरे विश्व के पर्यावरणवादी चिंतित हैं। पर मेरा लेख उस हरे रंग के बारे में नही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरा ही रंग है हमारे पडोसी देश पाकिस्तान के झंडे का। मुझे नही मालूम हरा रंग इस्लाम से भी जुडा हुआ है या नही; पर मैने बहुत से मस्जिद और दरगाहों को हरे रंग से पुते हुए देखा है। इस बावत एक रोचक वाक्या याद आता है। कई साल पहले मै जिस कम्पनी में था, हमने एक तकनीकी जानकारी बॉटने के लिये एक वेबसाइट बनाई थी और वो किसी के लिये भी खुली हुई थी। कोई भी व्यक्ति उस वेबसाइट पर अपना रजिस्ट्रेशन कर सकता था और चर्चा में भाग ले सकता था। ट्रैफिक मोनीटरिंग से पहले कुछ दिनों में एक रोचक तथ्य सामने आया कि ज्यादातर लोग जिन्होने साइट पर रजिस्ट्रेशन किया वो पाकिस्तान से थे। भारतीय उस साइट तक आकर भी बिदक जाते थे कि ये कोई पाकिस्तानी वेबसाइट है और पाकिस्तानी सहज ही खिंचे चले आते थे, क्यों? क्योंकि उस वेबसाइट का बैकग्राउण्ड कलर हरा था। पर मेरा लेख उस हरे रंग के बारे में भी नही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर ये लेख है किस बारे में, भैया, लेख है उस हरे रंग के बारे में जिसके पीछे दुनिया भागती है। वो हरा रंग जिसे दुनिया पहचानती है। वो हरा रंग सो सबसे मोहक है, हॉ प्रकृति की उन मोहक छटाओं से भी मोहक, जिनमें हरे रंग की प्रधानता होती है। अगर शीर्षक से आपने कुछ अंदाजा लगाया होगा तो आप सही हैं, डालर, जी हॉ ये लेख है डालर के बारे में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत की मुद्रा तो बहुरंगी है, जैसी हमारी संस्कृति है, लेकिन अमरीकी डालर का रंग है हरा, डालर की कीमत आप तब समझ सकते हैं जब आप दूर किसी देश के हवाई अड्डे पर हैं और आप वहॉ भारत जैसे किसी देश की मुद्रा निकालते हैं। यहॉ तक कि करेन्सी कन्वर्जन के लिये बैठे नराधम (मुद्रा परिवर्तक) भी डालर के अलावा किसी और मुद्रा को पहचानने से सरासर इन्कार कर देते हैं। आप डालर निकालिये, सामने वाला मुस्कराने लगता है, और आपका काम आसान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डालर की महिमा अपरम्पार है, ये लेख तो क्या ऐसे कई लेख कम पडेंगे उसका बखान करने में। अगर आपने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का इतिहास नही पढा तो जरूर पढें &lt;em&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/United_States"&gt;यहॉ&lt;/a&gt;&lt;/em&gt; या &lt;em&gt;&lt;a href="http://www.hartford-hwp.com/archives/40/index.html"&gt;यहॉ&lt;/a&gt;&lt;/em&gt; । अमरीका में सबसे पहले रहने वाले निवासी नेटिव इंडियन कहलाते थे। भारत की तरह ही सन् १४०० के बाद अमेरिका में भी यूरोपीय देशों (ब्रिटेन, फ्रान्स, पुर्तगाल आदि) की कई कालोनियॉ बन गई थीं और सन् १७७६ में १३ ब्रिटिश राज्यों ने स्वाधीन होने की घोषणा कर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की नींव डाली थी। अमेरिका आप्रवासियों से ही बना है। अमेरिका के ज्यादातर निवासी पूरी दुनिया से यहॉ आकर बसे हैं, ज्यादातर लोग यूरोप, उत्तरी अफ्रीका तथा मध्य पूर्व से आये हैं। एशिया से आये हुए लोगों की आबादी तकरीबन ४ प्रतिशत है। आज संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में ५० राज्य हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत से लोग संयुक्त राष्ट्र अमेरिका को केवल अमेरिका कहने में एतराज करते हैं क्योकि उत्तर अमेरिका पूरे महाद्वीप का नाम है जिसमें संयुक्त राष्ट्र अमेरिका एक देश है। भारत के आजाद होने के बाद कई भारतीय भी अमेरिका में आकर बसे हैं, ज्यादातर काम धन्धे वाले लोग पंजाब से या गुजरात से। गुजरात से आये हुए पटेलों के इतने मोटेल हैं कि अब मजाक में अमरीकी पटेलों को पोटेल कहा जाने लगा है। हर भारतीय अमरीकी दूतावास पटेलों के आवेदन पत्रों की बहुत बारीकी से जॉच पडताल करता है क्योंकि अमेरिका पँहुचने के लिये पटेलों ने तरह तरह के रास्ते निकाले हैं। अगर आप कभी मुम्बई स्थित अमरीकी दूतावास गये हों तो आपको यदा कदा गुजराती में होने वाली घोषणायें चौंका देंगी। कई वरिष्ठ गुजराती नागरिक ऐसे भी मिल जायेंगे जिन्हे अंग्रेजी नही आती फिर भी थोडी बहुत कठिनाई के बाद दूतावास से काम कराके ही वापस जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज ज्यादातर भारतीय विद्यार्थी अमेरिका आने के सपने ही नही देखते उन्हे साकार भी करते हैं। कई अमरीकी विश्वविद्यालय भारतीय विद्यार्थियों को दाखिला ही नही देते, बल्कि उन्हे छात्रवृत्ति भी उपलब्ध कराते हैं। किसी भी समय भारत स्थित किसी भी अमरीकी दूतावास में साक्षात्कार देते हुए आप बहुत से भारतीय विद्यार्थी पा सकते हैं, और उन्हे वीसा मिलने में भी कोई खास परेशानी भी नही आती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने कुछ मित्रों से यहॉ आने वाले उन लोगों के किस्से भी सुने हैं जो किसी अवैधानिक जहाज से मैक्सिको या कनाडा तक आये और फिर किसी तरह अमेरिका में दाखिल हुए। मेरे कुछ मित्रों ने यहॉ बसी हुई उन लडकियों की तलाश अपने विद्यार्थी जीवन में ही शुरू कर दी थी जो एक सुयोग्य भारतीय वर की तलाश में हों। कुछ सफल भी हुए और उन्हे एक अमरीकी नागरिक से विवाह करने के उपलक्ष्य में दुनिया की कुछ सबसे दुर्लभ चीजों में से एक, अमरीकी नागरिकता प्राप्त हुई। आज उनमें से एक तथा उनकी पत्नी अलग अलग राज्यों में रहते हैं और सप्ताहांत में ही कभी कभी मिल पाते हैं, क्या करें नौकरियॉ अलग राज्यों में हैं और एक की नौकरी से जीविकोपार्जन तो हो जायेगा लेकिन स्टेटस नही आ सकता। क्या कहा स्टेटस जरूरी नही जीवन में, अरे साहब अपनी सलाह अपने पास रखिये आप। क्या दुनिया में हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी अपने तौर से जीने का अधिकार नही। अपनी अपनी प्राथमिकतायें (प्रियोरिटीज) हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने मेरे कई मित्रों से कई बार इस बारे में वार्ता की और पाया कि लोगों में यहॉ कुछ साल गुजारने के बाद वापस लौटने में एक डर सा व्याप्त हो जाता है। भ्रष्टाचार, प्रदूषण तथा सुख सुविधाओं का अभाव गहरे कहीं दिमाग में कहीं अपने ही देश के बारे में हौवा खडा कर देता है। मेरे एक मित्र यह मानने को ही तैयार नही थे कि भारत में भी ए टी एम् हो सकते हैं (वो कई सालों से भारत नही गये)। या यह कि भारत में भी वेब साइट से बिल अदायगी सम्भव है। आज सब सारी दुनिया सस्ते चिकित्सकीय उपचार (मेडिकल टूरिस्म) के लिये भारत भाग रही है, भारत के ही लोग भारत में उपचार कराने से घबराते हैं। मजे की बात यह कि अमरीका स्थित अमरीकी चिकित्सा संस्थानों में भी ज्यादातर चिकित्सक भारतीय ही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असल में साफ सफाई, सडकों की हालत तथा ग्राहक अधिकारों में निश्चित रूप से अमरीका भारत से बेहतर है। अगर आप किसी भी दुकान से कोई सामान लेते हैं तो सन्तुष्ट न होने पर ९० दिनों में वापस कर सकते हैं। भारत की अधिकान्श रसीदों पर लिखा होता है "भूल चूक लेनी देनी", मतलब अगर बेवकूफ बन गये हो तो वापस शकल दिखाने की कोई जरूरत नही है। अगर दिखाई भी तो भी कुछ उखाड नही पाओगे। किसी भी दुकान में जाकर आप कुछ भी छू सकते हैं। वैसे अब भारत में भी ऐसे कुछ बाजार आ रहे हैं, पर दुरूपयोग होने की सम्भावनायें दुकानदारों में डर जगाती हैं। बच्चे खिलौनों की दुकानों पर जाकर किसी भी खिलौने से घण्टों खेल सकते हैं। हर जगह मुफ्त वाचनालय (लाइब्रेरी) की सुविधा सहज उपलब्ध है आप कितनी भी पुस्तकें ला सकते हैं। चोरी आदि की घटनायें बहुत कम हैं और अधिकतर अभियुक्त पकड लिये जाते हैं। टैक्स फाइल करना तथा अन्य लालफीतासाही बहुत कम है तथा कई काम बहुत आसानी से हो जाते हैं। बहुत से सरकारी काम इन्टरनेट पर ही हो जाते हैं। विद्युत व्यवस्था में अवरोध शायद ही कभी होता हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार इन सब चीजों की आदत पड जाने पर लोगों को वापस जाना थोडा बुरा तो लगेगा ही। वहीं दूसरी ओर भारत के कुछ सबसे बडे सकारात्मक पहलुओं में, सबसे पहले तो यह हमारी मातृभूमि है। सारे रिश्तेदार हैं भारत में। बीमार पडने पर चिकित्सा तथा दवाइयाँ बहुत सहज और सस्ती हैं। शाकाहारी लोगों के लिये भारत स्वर्ग है। यह हमारी सन्स्कृति है, जरूर ही भ्रष्ट हो रही है फिर भी सान्स्कृतिक झटकों की कोई सम्भावना नही है, या बहुत कम है। लोग इन्सानों से प्यार करते हैं, कुत्ते बिल्लियों को इन्सानी रिश्तों का विकल्प नही बनाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर ये तो थी थोडी सी तुलना, ये लिस्ट बहुत लम्बी की जा सकती है और हर किसी के अपने अपने विचार, अपनी अपनी प्राथमिकतायें हो सकते हैं इस बारे में। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैक्सिको और अन्य लातिन अमरीकी देशों के नागरिक यहॉ हिस्पैनिक्स कहलाते हैं और उन्हे अमरीका में एक अलग एथिनिक समूह की मान्यता प्राप्त है, भले ही वे श्वेत हों या श्याम। मेरे बहुत से अमरीका आने के इच्छुक मित्रों ने पहले कनाडा या मैक्सिको का रूख किया और एक बार वहॉ की नागरिकता प्राप्त कर फिर अमेरिका आये। ये सब लिख रहा हूँ कल के बुश साहब के उस एलान के बाद जिसमें उन्होने कहा कि मैक्सिको की सीमा पर ३००० से ६००० तक सैनिक तैनात किये जायेंगे ताकि अवैध घुसपैठ को रोका जा सके। स्वागत है बुश साहब। कब सीखेगा भारत और कब लगायेगा रोक उन अवैध बान्ग्लादेशियों पर जो पहले से ही ज्यादा आबाद भारत को और ज्यादा आबाद बना रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर कुछ भी हो लेकिन कल तक जो ब्रेन ड्रेन भारत के लिये समस्या लगता था आज भारत का सबसे उजला पक्ष है। सारे नही तो ज्यादातर भारतीय भारत के पक्ष में वातावरण बनाने का काम कर रहे हैं। जो देश सापों, साधुओं तथा भिखारियों का देश माना जाता था, बडी तादाद में मेहनतकश भारतीय कम्प्यूटर (संगणक) तकनीशियनों के चलते लोग अब सिक्के का दूसरा पहलू भी देख रहे हैं। बहुत ज्यादा दिन नही हुए जब स्टीवन स्पीलबर्ग ने Indiana Jones and the Temple of Doom (&lt;em&gt;&lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Indiana_Jones_and_the_Temple_of_Doom"&gt;इंडियाना जोन्स और टेम्पल आँफ डूम्स&lt;/a&gt;&lt;/em&gt;) नाम की फिल्म बनाई थी जो भारत का पहले वाला भ्रमकारक नकारात्मक पहलू दिखाती है। आज भारतीय समूह अमेरिका में एक शकतिशाली समूह है और बहुत से भारतीय भारत के राजदूत की तरह काम कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै भारतीय जनता पार्टी के उस इन्डिया शाइनिंग या भारत चमक रहा है नारे की तरह नारा तो नही लगाना चाहता लेकिन आने वाला भविष्य जरूर उज्जवल है और एक दिन हमारी मुद्रा भी मुद्रा बाजार में पहचानी जायेगी, यही उम्मीद है। दोस्तों उम्मीद लगाने में क्या है, कहते हैं ना उम्मीद पर आसमान टिका है। तो आइये हम सब मिलकर उम्मीद लगाये और इंतजार करें उस दिन का जब कोई गैर-भारतीय एक लेख लिखेगा "बहुरंगी मुद्रा भारत की"।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै जानता हूँ कई ऐसे मित्र होंगे जो मेरी बातों से सहमत नही होंगे, कुछ मेरा लिखा (अगर कहीं गलत है) सुधारना चाहेंगे, मै स्वागत करता हूँ उन सभी का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जय भारत जय हिन्द।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-------------------------------------------------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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/&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मै कौन हूँ? यह सवाल उठा था गौतम बुद्ध के मानस में और ना जाने कितने ही भारतीय सन्यासियों के मन में जो इस सवाल का उत्तर जानने के लिये वनगामी हुए। घबराइये मत या प्रसन्न न होइये, मै ऐसा कुछ भी नही करने वाला हूँ लेकिन जब लालों के लाल श्री समीर लाल जी ने टिप्पणी के द्वारा दुबारा &lt;a href="http://www.blogger.com/comment.g?blogID=26625939&amp;postID=114730634641296600"&gt;यही सवाल &lt;/a&gt;मेरी तरफ उछाल दिया है तो कुछ न कुछ लिखना तो लाजमी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मै एक इन्सान हूँ&lt;/strong&gt;, भारतीय हूँ और बेहद आम किस्म का भारतीय हूँ, अपनी पहचान के बारे में लिखने लायक कुछ है ही नही। और नाम में क्या रखा है आखिर। अगर केवल सम्बोधन की समस्या है तो मै आपको पूरी पूरी आजादी देता हूँ कि आप जो जी में आये सम्बोधित करें। छाया जी, या छायावादी जी या और कुछ। मै एक छाया हूँ एक परछाईं, एक प्रतिबिम्ब मात्र और परछाईं की कोई पहचान नही होती। परछाई के साथ कोई पहचानपत्रक जुडा नही होता। परछाईं घटती है बढती है, गायब भी हो जाती है। तो मुझे बस ऐसी ही एक छाया समझ लीजिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छाया का धर्म, राज्य, जाति या क्षेत्र नही होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी मै मेरे बारे में कुछ लिखता हूँ।&lt;br /&gt;परिवार रहा है बन्जारा किस्म का, बस कई राज्यों से सम्बंध रहा है। शायद मेरे किसी पूर्वज को यह शाप मिला होगा कि तुम्हारी दो पीढियॉ कभी एक शहर में तो क्या एक राज्य में भी नही रहेंगी तो मेरे परिवार का इतिहास रहा है राज्य दर राज्य भटकने का। और शायद मेरे साथ ये शाप कुछ ज्यादा रहा होगा तो मै भटक रहा हूँ देश दर देश दरवेशों की तरह। दिल में कहीं एक चाह है और बेहद तीव्र चाह है कि वापस मुझे जाना है अपने देश ही, आज नही तो कल, इस साल नही तो अगले साल, लेकिन जाना तो है जरूर ही वापस एक दिन। और बस हमेशा के लिये। लाख रो लूँ भ्रष्टाचार का रोना या प्रदूषण या देश के अविकसित होने का, कोई भी चीज मुझे डगमगा नही सकी अभी तक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा पेशा संगणक (कम्प्यूटर) से जुडा हुआ है तो यही कारण है कि जब तक जहॉ काम है अपनेराम हैं, काम खत्म तो बस राम राम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परदेश में दिनबदिन सान्स्कृतिक झटके लगते रहते हैं आखिर करूँ तो क्या करूँ हूँ तो विशुद्ध भारतीय ही। &lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;एक झटका तब लगा था जब बेटे के लिये विद्यालय दाखिले के लिये भरे जाने वाले फार्म में माता पिता की वैवाहिक स्थिति के लिये दिये गये विकल्पों को देखा था। कुछ इस प्रकार थे -&lt;br /&gt;१) विवाहित &lt;br /&gt;२) तलाकशुदा&lt;br /&gt;३) साथ में रहते हुए&lt;br /&gt;४) अकेले&lt;br /&gt;५) गोद लिया हुआ&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;खैर, &lt;blockquote&gt;दूसरा सान्स्कृतिक झटका लगा था जब हमने एक महिला एवं अमरीकी सहकर्मी का कार्यालय में जन्मदिन मनाया और तीन दिन बाद उससे पूछने की गुस्ताखी कर बैठे कि जन्मदिन की शाम उसने क्या किया। खुश होकर दिया गया जवाब था "मैने मेरा जन्मदिन तीन दिनों तक मनाया। वो शाम मैने अपने उस पुरुष मित्र के साथ गुजारी जिसके साथ मै पिछले दो सालों से रहती हूँ और शादी का अबतक कोई विचार नही बना। अगला दिन मैने मेरी मॉ और उनके वर्तमान पति के साथ रात्रिभोज किया और उसके अगले दिन मै मेरे पिता और उनकी वर्तमान पत्नी के साथ थी।"&lt;/blockquote&gt; &lt;br /&gt;सच बताऊँ तो मेरा दिमाग आगे कल्पना न कर सका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मालूम नही बाकी के भारतीयों के मन की हालत कैसी होती है इस देश में जब वो ये सब देखते सुनते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै कुछ ऐसे भी भारतीयों को जानता हूँ जो ग्रीन कार्ड के इन्तजार में कुंवारे बैठे हैं। असल में माजरा यह है कि वो यहॉ किसी प्रकार के बहुत सीमित समय के वीसा पर आये थे, जैसे ज्यादातर विद्यार्थी वीसा पर और अपनी पढाई पूरी करके नौकरी करने लगे। अब ये लोग वापस इसलिये नही जा सकते क्योंकि अगर गये तो वापस लौट नही सकते। इन्हे फिर से कोई अमरीकी दूतावास वीसा नही देगा, क्योंकि इन्होने पहले पाये हुए वीसा का अतिक्रमण किया है। ग्रीन कार्ड की अप्लीकेशन लम्बित है अमरीका में। तो क्या हुआ अगर शादी की उम्र निकली जा रही है, तो क्या हुआ अगर घर में बूढे मॉ बाप सालों से इन्तजार कर रहे हैं कि बेटा आयेगा एक दिन। भारत में शादी के साथ एक समस्या है, अपनी खुद की शादी में और कोई हो या न हो तुम्हे तो उपस्थित होना ही पडता है। तो अगर भारत नही जा सकते तो शादी भी नही कर सकते। क्योंकि जिस चीज के लिये इतनी मेहनत की और पसीना बहाया (अच्छी लडकी और अच्छा दहेज) वो तो भारत में ही मिलेगा ना। अब लडकी वाले तो अमरीका आकर शादी करने से तो रहे। बस कट रही है जिन्दगी इन्तजार में उस छलावे के जिसका नाम है ग्रीन कार्ड। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ऐसे भी भारतीय परिवार हैं जिनके बडे बुजुर्ग, जो कुछ बीस तीस साल पहले यहॉ आये थे, अब वापस जाना चाहते हैं, पर उनकी यहॉ जन्मी और पली बढी सन्तानों ने विद्रोह कर दिया है। अगर कोई बच्चा अमरीका में पैदा हुआ तो वो कानूनन् अमरीकी नागरिक होता है मैने मेरे आसपास के भारतीय परिवारों में अमरीका में रहते हुए ही बच्चा पैदा करने की होड सी देखी है। मेरे एक विदेशी मित्र के एक समय के उद्गार मुझे याद आते हैं, जिधर देखो बस गर्भवती भारतीय महिला ही नजर आती है। खून का घूँट पीकर मै चुप रह गया था, क्योंकि सच ही था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, तो मै बात कर रहा था उन भारतीय परिवारों की जिनके बडे बुजुर्ग अब वापस जाना चाहते हैं पर सन्तानें नही जाना चाहतीं। अब सन्तानें हैं अमरीकी नागरिक, तो मॉ बाप की भला क्या हैसियत। एक बार बच्चे दस बारह साल के हुए नही कि सान्स्कृतिक अन्तर या बदलाव दो पीढियों के अन्तर्विरोधों में बदल जाता है। आखिरकार मॉ बाप को हारकर झुकना पडता है, भारत न जाकर यहीं रहना पडता है क्योंकि बच्चे कह देते हैं कि आपको जाना हो तो जाइये, मै तो यहीं रहूँगा या रहूँगी। जबरदस्ती किसी अमरीकी नागरिक को भारत ले जा नही सकते और हैं तो आखिरकार भारतीय मॉ बाप ही ना, तो अपनी औलाद को छोडकर भला कैसे चले जायें। पडें हैं परदेश में औलाद की खातिर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप एक पुत्री के पिता हैं तो आप आसमान से नीचे गिरते हैं जब आपकी बारह साल की लडकी रात भर घर से बाहर रहने के लिये अनुमति माँगती है या सप्ताहाँत में गायब रहती है। रास्ते चलते आप क्या करेंगे जब आपका बच्चा आपके साथ है और सामने हो रहा है लाइव टेलीकास्ट चुम्बन का। कुछ समय बाद बच्चे खुद ही समझदार हो जाते हैं और इन्हे जीवन की सामान्य घटनाओं की तरह नजरअन्दाज कर देते हैं, लेकिन आप अपने दिल का क्या करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी ही बार मैने बस में बेहद छोटे उम्र के बच्चों को वयस्कों को भी शर्मा दे ऐसी हरकतें करते देखा है, कोई शर्म नही, लिहाज नही। जब जब मै किसी बुजुर्ग के लिये अपनी सीट छोडकर खडा हुआ उन्होने अचरज से कहा unlike your age, मतलब तुम्हारी उम्रवाले ऐसा नही करते आमतौर पर। कई बार तो मैने युवाओं को बडी ढिठाई के साथ बुजुर्गों के लिये आरक्षित सीटों पर जमे पाया और बुजुर्गों को उनके सामने खडा। कान में आईपाड या एम पी ३ लगाये ये युवा या बच्चे मशीनी सम्वेदनहीनता का ऐसा भद्दा अमरीकी चेहरा प्रस्तुत करतें हैं कि मन सोचने लगता है कि इस देश में बसने का निर्णय कोई भारतीय कैसे ले सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक मै मेरे किसी भी पोस्ट में किसी भी व्यक्ति का या स्थान का नाम लेने से बचता रहा हूँ। मेरा मानना है कि घटनायें और वो भी सच्ची घटनायें व्यक्ति या स्थान जैसी संज्ञाओं से ऊपर होती हैं। लेकिन मै भारत के एक प्रदेश का नाम लेना चाहता हूँ, आन्ध्रप्रदेश, मैने भारत के इस अकेले राज्य से अमरीका में कितने ही विद्यार्थी देखे। कुछ विद्यार्थियों से पूछा भी यार ऐसा क्यों है, कि जो भी भारतीय विद्यार्थी मिलता है वो आन्ध्र का ही होता है, तो उनका जवाब था कि "आन्ध्र समाज में अमरीका जाने पर लडके की कीमत बढ जाती है, और उन विद्यार्थियों के लिये जो अमरीका आना चाहते हैं बहुत सारे दिशानिर्देश सहज ही उपलब्ध हैं। आपको लगभग हर घर में एक विद्यार्थी या नौकरीशुदा व्यक्ति तो मिलेगा ही जो अमरीका में हो। हर विद्यार्थी विद्यालय में पढते समय ही पूरा प्लान बना चुका होता है कि वो किस अमरीकी यूनिवर्सिटी में दाखिले का प्रयास करेगा।" मैने पाया कि आन्ध्र समाज के बहुत बडे और समर्थ समूह हर जगह मौजूद हैं जो किसी भी आन्ध्रप्रदेशी विद्यार्थी या नौकरीशुदा व्यक्ति की यथासम्भव मदद के लिये तैयार रहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कहॉ लिखने बैठा था मै अपनी पहचान के बारे में और कहॉ भटक गया।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जब भी कोई भारतीय यहॉ मुझे मिलता है, छूटते ही प्रश्न तैयार, भारत में कहॉ से? ऐसा क्यों, अरे भाई भारत से हूँ क्या यही कम नही, किसी प्रदेश का लेबेल लगाना जरूरी है क्या? मुझे मालूम है कि सामने वाला मुझे अपनी कसौटी में कसने को बेताब है। &lt;br /&gt;दक्षिण भारतीय या उत्तर भारतीय?&lt;br /&gt;उत्तर भारतीय हैं तो किस प्रदेश से?&lt;br /&gt;दक्षिण भारतीय हैं तो केरल के मालाबारी या तमिल या तेलगु या फिर कन्नड।&lt;br /&gt;उत्तर भारतीय हैं तो ठाकुर, ब्राह्मण या वैश्य हैं या फिर कुछ और।&lt;br /&gt;ब्राह्मण तो कौन से, सरयूपारीण या कान्यकुब्ज, या फिर सनाढ्य या गौड या ....।&lt;br /&gt;महाराष्ट्रियन हैं तो कोंकनस्थ हैं या देशस्थ, मराठा या फिर सीकेपी या ....।&lt;br /&gt;उडिया है पन्जाबी हैं या बंगाली हैं, भारतीय अजनबी के लिये आपकी जाति, क्षेत्र आपसे पहले आता है, और जब सवालों के जवाब मिल जाते हैं तो आपके लिये उसके पास पूर्वागृहों का पूरा पूरा खाका तैयार हो जाता है। अच्छा तो ये बन्दा हिन्दी बोलने वाला उत्तर भारतीय है, हुँह, गन्दे लोग, यही हैं जिन्होने भारतीयों की छवि खराब कर रखी है। या अच्छा तो ये बन्दा हिन्दी विरोधी, साम्बर खाने वाला दक्षिण भारतीय हैं, हुँह, पता नही अपने आपको क्यों श्रेष्ठ समझते हैं ये लोग। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारत में इतने अन्तर्विरोध हैं और हम बाहर जाकर भी उनका टोकरा लादे घूमते हैं, क्यों?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;लाख अमरीकी सभ्यता या सन्स्कृति से मै सहमत न होऊँ लेकिन इस बात की मै जरूर दाद दूंगा कि ज्यादातर अमरीकियों के लिये आप क्या हैं ये मायने रखता है कि आप वास्तव में क्या हैं? आप कितने काम के आदमी हैं? बस, आपकी जाति आदि बहुत पीछे छूट जाती है, पर मैने "ज्यादातर अमरीकियों के लिये" उपयोग किया क्योंकि, क्योंकि कुछ पागल आपको हर जगह, हर देश, हर सन्स्कृति में मिलेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बस अब बस करता हूँ।&lt;/strong&gt; इस उम्मीद के साथ कि अब मुझसे मेरी पहचान नही पूछी जायेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टैगः &lt;a href="http://technorati.com/tag/anugunj" rel="tag"&gt;anugunj&lt;/a&gt;, &lt;a href="http://technorati.com/tag/अनुगूँज" rel="tag"&gt;अनुगूँज&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-------------------------------------------------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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दो पोस्ट पर टिप्पणियॉ नही मिलीं,  शायद मेरा लिखने का उत्साह जाता रहता, अगर मेरी नजर स्टेट्सकाउन्टर पर ना पडी होती जो कहता है कि बहुत से इन्टरनेट प्रवासियों ने मेरे चिठ्ठे पर अपनी कृपादृष्टि डाली है। इतना ही बहुत समझ आगे लिखता हूँ। अगर आप भूले भटके मेरे ब्लोग तक आयें और टिप्पणी के लायक समझें कृपया कन्जूसी न करें। आपकी टिप्पणियॉ ही मेरे आगे लिखने का सम्बल हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो मैने पिछली पोस्ट में आपको बताया था कि कैसे मै जंगल के बीच स्थित इस कम्पनी तक पँहुचा और आश्चर्यजनक तरीके से चुना गया उस साक्षात्कार में, जिसके बारे में मुझे कुछ भी पूर्वानुमान या पूर्वाभास न था। खैर मित्र का साथ था और कुछ वो एकान्त सी जगह, और वो सुन्दर सा संयन्त्र मुझे पसन्द सा आ गया था, तो बस फिर मैने वो नौकरी शुरू कर दी। रहने के लिये कुछ दिनों तक अतिथिगृह था और कुछ समय बाद कम्पनी द्वारा एक अपार्टमेन्ट दिया गया। अब उस उजाड जंगल में भला कौन मुझे घर देता, या मै कहॉ घर ढूँढता, तो कम्पनी ही सबके रहने का प्रबन्ध करती थी।  कम्पनी की अच्छी खासी बस्ती थी। बस्ती क्या पूरी दुनिया थी जहॉ सब कुछ था जैसे गली, मोहल्ले, चौराहे, चबूतरे, चौपाल, ऊँच-नीच, क्षेत्रीयता, धर्म, जॉत-पॉत, बिरादरी आदि आदि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे शुरू में तो लोगों ने थोडा जाँचा परखा पर थोडे ही दिनों में अच्छा खासा मित्र वर्ग बन गया। काम था तकनीशियनों को देखना, उन्हे काम देना, हाजिरी लेना, घन्टों का हिसाब रखना, कुल मिलाकर प्रबन्धन करना और कुछ वरिष्ठ अधिकारी थे ही। तो वे वरिष्ठ अधिकारीगण मुझे काम देते थे जो मै मेरे तकनीशियनों को देता था, कुल मिलाकर middleman  या बीच वाला काम था। संयन्त्र बहुत बडा था तो काम भी बहुत था और पूरा पूरा दिन भागते भागते ही गुजर जाता था। रखरखाव तथा सुधार मेरा विभाग था। तमाम उपकरणों की देख रेख करना, उनकी बीमारियों का उपचार करना। तकनीशियनों की एक दवा थी जो उनसे काम करवा सकती थी और वो थी ओवरटाइम यानी अतिरिक्त घन्टे, जिसका उन्हे दोगुना पैसा मिलता था। ज्यादातर तकनीशियन अच्छे थे पर कुछ बेहद बददिमाग भी थे। उनसे काम करवाना तो दूर बात करना भी बडा कठिन था। उनके लिये ओवरटाइम भी काम का नही था। कुल मिलाकर अकल के दुश्मन किसे कहते हैं, ये तब समझ में आया।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;शाम को हम दोस्त (संयन्त्र के साथी) ताश खेलते थे। बाद में हमने चन्दा जमा कर एक टेलीविजन ले लिया था। पूरे तो नही पर कुछ चैनेल आते थे। रोज काम करने वाले दोस्तों के साथ रहने का सबसे बडा नुकसान था कि हम उस संयन्त्र की बातों से कभी बाहर नही निकल पाते थे। कभी कभी बडी कोफ्त भी होती थी। सप्ताह में छः दिन हम काम करते थे। रविवार हम देर से सो कर उठते, थोडा घूमने जाते। घूमने के लिये खास कुछ था ही नही। छोटी सी बस्ती, संयन्त्र और आसपास घना जंगल था, कुछ शहरी सभ्यता से दूर ग्रामीण बस्तियॉ भी थीं, जंगल में ही एक हनुमान जी का मन्दिर था। जब कभी कार्यदिवसो में मै संयन्त्र से जल्दी वापस आता, किसी एक मित्र के साथ उस मन्दिर हनुमान जी के दरबार में जाता। मन्दिर एकदम जंगल के बीच में होने के कारण पंडित जी उसे सूर्य ढलने के थोडी देर बाद ही बन्द कर देते थे। कितनी ही बार वो मन्दिर हमें बन्द मिलता था, तो बस बाहर से ही हाथ जोड लेते थे हनुमान जी बाबा को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन्दिर से लौटते वक्त अक्सर अन्धेरा हो जाता था। एक घटना याद आ रही है, एक बार कई अन्य मौकों की तरह मुझे और मेरे मित्र को मन्दिर बन्द मिला और हम दुःखी-भारी मन से वापस लौट रहे थे। ना जाने किस विषय पर बातें कर रहे थे और मेरा ध्यान सडक पर बिल्कुल भी नही था। अचानक मेरा मित्र चिल्लाया "सॉप, सॉप" और पलक झपकते ही वो दौडकर कुछ फुट आगे चला गया। अब नजारा ये था कि बीच मे था एक फन उठाये बैठा गेँहुअन नाग, जो अनिश्चय की सी स्थिति में था, मै एक तरफ और मेरा मित्र दूसरी तरफ। मै था जंगल की तरफ और मेरा मित्र संयन्त्र की तरफ। कितने ही क्षण हम ऐसे ही खडे रह गये, मै हनुमान चालीसा पढते हुये। शायद खुद ही ऊबकर सॉप पास की एक झाडी में चला गया और उसके बाद मै ऐसा भागा कि बस पूछिये मत, मेरे दोस्त को भी पीछे छोड दिया मैने, जो मुझे रुकने को कहता पीछे पीछे आया। सीधा अपार्टमेन्ट पँहुचकर ही दम लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन्दिर के पीछे एक रास्ता जाता था जिसके बारे में हम लोग रोज सोचते थे और विमर्श करते थे कि ये कहॉ जाता होगा यार ये रास्ता भला इस घने जंगल में। जिन्दगी और संयन्त्र की भागदौड में न हमें कभी वक्त मिला न साहस हुआ और न कभी हम लोग जा पाये उस रास्ते पर बहुत दिनों तक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई दिनों तक काम करने के बाद मन ऊबने लगा था, संसार से कटा हुआ जीवन। सप्ताह में दो बार कम्पनी की बस शहर जाती थी, फिर वही बस वापस आती थी। उससे शहर जाकर तीन घन्टों के अन्तराल में खरीददारी की जा सकती थी जिसका हम "छडे" भरपूर लाभ उठाते थे। कभी कभी हम शहर जाकर फिल्म भी देखते थे। लेकिन संयन्त्र, संयन्त्र और संयन्त्र ही दिमाग पर छाया रहता था ऐसा लगता था कि बाकी दुनिया से हम बहुत दूर हैं। हम एक ऐसी जगह थे, जहॉ सारे काफी पुराने से हो चुके उत्पाद पँहुचते थे। हम टेलीविजन पर उत्पादों के विज्ञापन देखते थे ये जानते हुए कि यह उत्पाद जब तक हम तक पँहुचेगा कई महीने गुजर चुके होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिरकार डेढ साल बाद जब कुछ ही समय के अन्तराल में मैने आसपास कुछ दुर्घटनायें देखीं, तब मेरा पहले से ही कुछ उखडा सा मन उस जगह से पूरी तरह से उठ गया। संयन्त्र में एक उपकरण में एक दुर्घटना में एक तकनीशियन घायल हो गया और हमारे साथ काम करने वाले तथा साथ ही रहने वाले एक घनिष्ठ मित्र की संयन्त्र के बाहर अचानक एक दुर्घटना में अकाल मृत्यु हो गई। तब मुझे पता चला कि मन्दिर के पीछे का रास्ता श्मशानघाट को जाता था, जो नदी के किनारे था। शायद यह प्रकृति का हमें वह रास्ता दिखाने का, अपना तरीका था। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उन घटनाओं के कुछ ही दिनों बाद मैने वह जगह और वह नौकरी छोड दी। बाकायदा इस्तीफा दिया, कुछ लोगों ने रोकने की कोशिश भी की। कई सालों पहले मैने उस जगह को आखिरी सलाम किया और फिर उस जगह को कभी नही देखा। आज सोचता हूँ तो लगता है जैसे मिली थी वह नौकरी वैसे ही छोड दी बिना किसी तैयारी के। भटकाव का कुछ समय, और जीवन के कुछ वो साल जिन्हे शायद हम दुबारा न जीना चाहें, उनमें मै मेरे जीवन के उस समय को शामिल करूंगा, पर यह अपने हाथ में तो होता नही। हम उस पत्ते की तरह है हवा जहॉ चाहती है उडाकर ले जाती है और हम भरते है दम्भ हमने ये किया वो किया। शायद ही कभी हम जो सोचते हैं वो यथार्थ में होता है। इटली की एक कहावत है "man proposes GOD disposes" या उसके कुछ करीब हिन्दी में जब इन्सान सोचता है तब भगवान हँसता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी मै सोचता हूँ ये जीवन एक लौहपथगामिनी-स्थानक जैसा है। लोग मिलते हैं, कुछ दूर साथ चलते हैं और बिछडते हैं। सबका अपना अपना गन्तव्य है। कोई थोडी दूर साथ चलता है कोई बहुत दूर तक साथ देता है। कुछ लोग तुरन्त मित्र बन जाते हैं कुछ आपको परखते हैं और कुछ को परिस्थितियॉ आपका मित्र बनाती हैं। कुछ लोग साथ चलकर भी कभी मित्र नही बनते, कुछ मित्र बनकर फिर दूर हो जाते हैं। लोग आते जाते रहते हैं, और कुछ लोग अपने निशान छोड जाते हैं। कुछ से हम दुबारा मिलना चाहते हैं, कुछ जगहों पर दुबारा जाना चाहते हैं, भले ही अब कोई भी पहचानने वाला न बचा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी सन्दर्भ में राजेश खन्ना अभिनीत अमर हिन्दी फिल्म "आनन्द" का वो सम्वाद याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हम सब रंगमंच की कठपुतलियॉ हैं जहॉपनाह; कौन, कब, कहॉ, कैसे उठेगा कोई नही बता सकता"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सार मात्र यह है कि "सब कुछ पूर्वनियोजित है, हम केवल नेक कर्म कर सकते हैं पर जीवन की ज्यादातर घटनाओं पर हमारा बस नही।" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर से फिल्मो की भाषा में कहूँ तो "जो होना है सो होना है, फिर किस बात का रोना है"। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या गीता के अनुसार "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कर्म किये जा फल की चिन्ता मत कर ऐ इन्सान"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर यादें, वो तो हैं आती हैं और बदस्तूर (सतत्) आती हैं। आज मुझे उस जगह को आखिरी बार देखे बरसों हो गये ना मै उस तरह के किसी संयन्त्र में हूँ और ना ही वहॉ काम कर रहे किसी व्यक्ति से मेरा कोई भी सम्पर्क बचा है। पर आज भी मै कभी कभी रात में सपनों में उन विद्युत उपकरणों के बीच चला जाता हूं या हनुमान जी का वो जंगल मध्य स्थित मन्दिर याद आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[समाप्त]&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;!-- Start of StatCounter Code --&gt;
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